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बाल श्रमिकों के परिवारों को सहायता राशि

मार्च 2020 में भारत में कोविड -19 महामारी की चपेट में आने के तुरंत बाद देशव्यापी तालाबंदी लागू होने से देश भर के उन लाखों श्रमिकों को अपने घरों को लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा, जो आय या सामाजिक सुरक्षा से वंचित थे. हालांकि शहर से गांव लौटने के बाद भी उनकी परेशानी खत्म नहीं हुई. उनमें से कई परिवार गांव आने के बाद बेरोजगार हो गए. लॉकडाउन के चलते उन्हें किसी तरह का काम नहीं मिल रहा था. इनमें से ज्यादातर खेतिहर मजदूर थे लेकिन गर्म मौसम के कारण उन्हें खेतों में भी काम नहीं मिल रहा था. राजस्थान के अजमेर जिले का किशनगढ़ प्रखंड भी कोरोना से बुरी तरह प्रभावित था.

रेलवे प्लेटफॉर्म पर रहने वाले आज के सफल बच्चे

विक्की राय और पंकज गुप्ता जैसे युवा से बहुत लोग भली-भांति परिचित होंगे. विक्की राय जाने-माने फोटोग्राफर हैं और पंकज गुप्ता थिएटर डायरेक्टर और एक्टर हैं. बहुत लोगों ने उन्हें फिल्म ‘ओए लकी, लकी ओए’ में देखा होगा. जब वह कोरोना महामारी के दौरान जुटाई गई धनराशि से जरूरतमंदों की मदद करने में व्यस्त थे, इसी दौरान 12वीं कक्षा के छात्र गौरव स्कूली बच्चों को शेल्टर में कंप्यूटर का उपयोग करना सिखा रहे थे. जरूरतमंद लोगों के लिए सहायता प्रदान करने के एक उत्कृष्ट प्रणाली स्थापित करने से पहले, इन युवा उद्यमियों का बचपन कठिनाइयों से भरा रहा है. इनका अधिकतर जीवन रेलवे प्लेटफार्म पर बीता है. वही इनका स्थाई ठिकाना हुआ करता था.

आर्थिक रूप से प्रभावित बच्चों के लिए नाइट शिफ्ट स्कूल विकल्प बना

ग्यारह वर्षीय रूबी (बदला हुआ नाम) ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था, क्योंकि उसके पिता एक गरीब किसान हैं जो ज़मीन के एक छोटे टुकड़े पर खेती करते हैं और उसकी मां हंसा देवी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत एक मजदूर के रूप में काम करती हैं. दो छोटे भाई-बहनों की देखभाल के लिए प्रतिदिन माता-पिता रूबी को घर पर छोड़ देते हैं. सुबह-सुबह रूबी आधा किमी दूर एक हैंडपंप से पानी लाती है, बकरियों को खाना खिलाती है और अपनी माँ को खाना पकाने और घर के अन्य कामों में मदद करती है, लेकिन कभी-कभी परिवार की अतिरिक्त वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए वह भी मज़दूरी करने बाहर जाया करती है.