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कोरोना ने स्ट्रीट चिल्ड्रन को अपराधी बनने पर मजबूर किया

कोरोना महामारी ने न केवल आम परिवारों को प्रभावित किया है बल्कि सड़क पर रह कर ज़िंदगी गुज़ारने वाले बच्चों को अपराध की दुनिया में धकेल दिया था. बालकनामा में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, सड़क पर रहने वाले कई बच्चे जो प्लेटफॉर्म पर निर्भर थे या जिनके परिवार अपनी आजीविका के लिए रेलवे प्रणाली पर निर्भर थे, महामारी के दौरान जीवित रहने के लिए ड्रग्स, लौह अयस्क बेचने पर मजबूर हो गए थे. इतना ही नहीं, उन्हें चोरी करने या भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता था.

बेसहारा बच्चों को चाहिए पहचान पत्र

मार्च 2020 में कोविड -19 के प्रकोप के बाद देश भर के रेलवे को बंद कर दिया गया था. इसके कारण रेलवे प्लेटफॉर्म पर निर्भर रहने वाले हजारों बच्चे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी आजीविका से वंचित हो गए थे. ऐसे में कई बच्चे भोजन की तलाश में मंदिरों और गुरुद्वारों में भीख मांगने को मजबूर हो गए थे. कुछ बच्चे सिग्नलों पर भीख मांगने लगे, हालांकि उन्हें समय-समय पर पुलिस द्वारा फटकार भी लगाई जाती थी.

मिशन वात्सल्य और चाइल्ड हेल्पलाइन के विलय से बाल संरक्षण में कितना सुधार होगा?

बाल संरक्षण सेवाओं के लिए मिशन वात्सल्य योजना के तहत चाइल्ड लाइन के लिए सरकार द्वारा मसौदा दिशा निर्देश प्रकाशित किए गए हैं. साथ ही सरकार और चाइल्ड लाइन के मौजूदा नागरिक समाज के हितधारकों के बीच हेल्पलाइन नंबर को आपातकालीन हेल्पलाइन के रूप में अपडेट किया गया है. नंबर के साथ विलय अभी तक किसी भी संभावित समाधान पर नहीं पहुंचा है. विलय के बाद हेल्पलाइन को गृह मंत्रालय के यूनिवर्सल इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर 112 में मिला दिया जाएगा. इस संबंध में गुजरात के वडोदरा में चाइल्ड हेल्पलाइन स्टाफ के तौर पर काम करने वाली मोक्षा कहती हैं.

तकनीक के माध्यम से बाल तस्करी रोकेगा रेलवे

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन जैसी अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसियों की महामारी के दौरान और बाद में बाल तस्करी के मामलों में तेज वृद्धि की चेतावनी के खिलाफ रेलवे पुलिस बल भी सक्रिय हो गया है. जिसमें बाल तस्करों से निपटने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना है. दिसंबर 2021 में एक नया एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) जारी किया गया है जो रेलवे पुलिस अधिकारियों से लेकर स्टेशन अधिकारियों तक की विभिन्न जिम्मेदारियों को अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है.

मिशन बुनियाद के माध्यम से शैक्षिक अंतर को भरने का प्रयास

दिल्ली के साकेत इलाके के एक सरकारी स्कूल की छात्रा पूजा पिछले दो साल से स्कूल के दोबारा खुलने का इंतजार कर रही थी. महामारी के दौरान ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की गईं लेकिन वह लगभग सभी कक्षाओं से चूक गई क्योंकि उसके पास मोबाइल फोन नहीं था. पूजा कहती हैं, ”मैं अपने दोस्त के घर सिर्फ इसलिए जाती थी कि मैं ऑनलाइन क्लास अटेंड कर सकूं, लेकिन ज्यादातर समय मुझे अपने घर पर ही रह कर घर के कामकाज में हाथ बटाना पड़ता था.

प्लेटफॉर्म पर रहने वाले बच्चों को कौशल विकास से जोड़ने की ज़रूरत

पुनीत 18 साल का युवक है, जब वह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कूड़ेदान से प्लास्टिक की खाली पानी की बोतलें उठाता है, तो वह अपने इस उद्देश्य को से भली भांति परिचित है, लेकिन थोड़ा नर्वस भी होता है. सुबह का सूरज चमक रहा है और पूरे दिन के लिए उसकी योजनाएं निर्धारित हैं. वह अब कबाड़-खरीदारों की गली में जाएगा, जहां वह प्लास्टिक की बोतलें रीसाइक्लिंग करने वालों को इकठ्ठी की गई बोतलें बेच देगा. जब वह छोटा था तो पेट भरने के लिए भीख मांगता था.

कोरोना के बाद बाल श्रम में चिंताजनक वृद्धि

कोरोना महामारी के दौरान, देश में बाल श्रम में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है, जो जनसंख्या के बड़े वर्ग के बीच गंभीर आर्थिक संकट का संकेत देता है. सरकार के खुद के आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के अलावा इस वायरस ने उन्हें कम उम्र में ही काम करने पर मजबूर कर दिया है. बच्चे न सिर्फ घरेलू बल्कि खतरनाक काम भी कर रहे हैं. संसद में पेश राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 से 2020-21 के बीच बाल श्रमिकों की संख्या में 6.18 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 2019-20 में 54,894 बच्चों को श्रम कार्य से मुक्त कराया गया और 2020-21 में यह संख्या बढ़कर 58,289 हो गई जबकि 2018-19 में यह संख्या 50,284 थी.

बाल श्रमिकों के परिवारों को सहायता राशि

मार्च 2020 में भारत में कोविड -19 महामारी की चपेट में आने के तुरंत बाद देशव्यापी तालाबंदी लागू होने से देश भर के उन लाखों श्रमिकों को अपने घरों को लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा, जो आय या सामाजिक सुरक्षा से वंचित थे. हालांकि शहर से गांव लौटने के बाद भी उनकी परेशानी खत्म नहीं हुई. उनमें से कई परिवार गांव आने के बाद बेरोजगार हो गए. लॉकडाउन के चलते उन्हें किसी तरह का काम नहीं मिल रहा था. इनमें से ज्यादातर खेतिहर मजदूर थे लेकिन गर्म मौसम के कारण उन्हें खेतों में भी काम नहीं मिल रहा था. राजस्थान के अजमेर जिले का किशनगढ़ प्रखंड भी कोरोना से बुरी तरह प्रभावित था.

रेलवे प्लेटफॉर्म पर रहने वाले आज के सफल बच्चे

विक्की राय और पंकज गुप्ता जैसे युवा से बहुत लोग भली-भांति परिचित होंगे. विक्की राय जाने-माने फोटोग्राफर हैं और पंकज गुप्ता थिएटर डायरेक्टर और एक्टर हैं. बहुत लोगों ने उन्हें फिल्म ‘ओए लकी, लकी ओए’ में देखा होगा. जब वह कोरोना महामारी के दौरान जुटाई गई धनराशि से जरूरतमंदों की मदद करने में व्यस्त थे, इसी दौरान 12वीं कक्षा के छात्र गौरव स्कूली बच्चों को शेल्टर में कंप्यूटर का उपयोग करना सिखा रहे थे. जरूरतमंद लोगों के लिए सहायता प्रदान करने के एक उत्कृष्ट प्रणाली स्थापित करने से पहले, इन युवा उद्यमियों का बचपन कठिनाइयों से भरा रहा है. इनका अधिकतर जीवन रेलवे प्लेटफार्म पर बीता है. वही इनका स्थाई ठिकाना हुआ करता था.

आर्थिक रूप से प्रभावित बच्चों के लिए नाइट शिफ्ट स्कूल विकल्प बना

ग्यारह वर्षीय रूबी (बदला हुआ नाम) ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था, क्योंकि उसके पिता एक गरीब किसान हैं जो ज़मीन के एक छोटे टुकड़े पर खेती करते हैं और उसकी मां हंसा देवी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत एक मजदूर के रूप में काम करती हैं. दो छोटे भाई-बहनों की देखभाल के लिए प्रतिदिन माता-पिता रूबी को घर पर छोड़ देते हैं. सुबह-सुबह रूबी आधा किमी दूर एक हैंडपंप से पानी लाती है, बकरियों को खाना खिलाती है और अपनी माँ को खाना पकाने और घर के अन्य कामों में मदद करती है, लेकिन कभी-कभी परिवार की अतिरिक्त वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए वह भी मज़दूरी करने बाहर जाया करती है.