Project Disha – APF Poem

अकेले उन रास्तों में वह सहम सी गई थी

अकेले उन रास्तों में वह सहम सी गई थी।
वह चार थे और बेचारी अकेली खड़ी थी।।

बेदर्द है जमाना सुना था उसने।
लग रहा था वह बेदर्दी देखने वाली थी।।

चाह नहीं है अब मुझको

चाह नहीं है अब मुझको, कहलाऊँ मैं सीता जैसी।
अब तो बस उड़ना चाहती हूं, बिल्कुल कल्पना जैसी।।

फिर क्यों बनूं मैं द्रौपदी जैसी।
कहां बचा है कोई अब कृष्ण जैसा।।

स्वच्छता

आओ मिलकर एक कदम उठाएं,
स्वच्छता पर एक ध्यान लगाएं।

सुनो, जागो और स्वच्छता को मिशन बनाओ,
साफ-सफाई का रखोगे ध्यान तब बनेगा भारत महान।।

क्यों घुट घुट जाती हूं

क्यों घुट-घुट जाती हूं,
बंद कमरे में रहती हूं ।।

दर्द पीड़ा मैं सहती हूं,
फिर भी कुछ नहीं कहती हूं।।

औरत कोई सामान नहीं

औरत है, कोई सामान नहीं।
अकेली है, मगर कमजोर नहीं।।

औरत है, कोई सामान नहीं।
सिर्फ जिस्म नहीं, जान भी होती है।

नारी के बिना

नारी बिना संसार अधूरा है।
खुशबू बिना जैसे फूल अधूरा है।।

जैसे संसार बिना इंसान अधूरा है।
धरती बिना अंबर अधूरा है।।

किताबों की दुनिया

किताबों की अनूठी दुनिया है महान।
स्वच्छ, सफलता और शिखर का इसमें ज्ञान।।

मुश्किल है थोड़ा इसको पढ़ना।
लेकिन यह है शिक्षा का भण्डार।।

नारी नहीं है अभिशाप

क्यों समझा है नारी को अभिशाप।
मत करो उसपर अत्याचार।।

जो करनी हो समाज की रक्षा।
तो करो पहले नारी की सुरक्षा।।

स्त्री

उसकी एक मुस्कान हर गम को भुला देती है।
इसका एक स्पर्श ममता भी कहलाती है।।

वह जन्म देती है, सारी दुनिया को।
दुर्गा भी वही, काली भी कहलाती है।।

उड़ान

उड़ना है हमको उड़ना है।
पंछी की तरह उड़ना है।।

अब न किसी से डरना है।
हर मुश्किल से लड़ना है।।

वक्त ये भी बदल जाएगा जनाब

वक्त ये भी बदल जाएगा जनाब,
वक्त वो भी बदल गया था, वक्त ये भी बदल जाएगा ।
क्या हुआ जो आज टूटा है, कल फिर मुस्कुराएगा ।।

सब कुछ बदल जाता है आने वाले वक्त के साथ
कुछ सपने टूट जाते हैं, तो कुछ सपने रंग लाते हैं। 
वक्त यह भी बदल जाएगा जनाब….।।

गर्भ में भी मुझ पर लटक रही थी एक तलवार

गर्भ में भी मुझ पर लटक रही, थी एक तलवार।।
जन्म लिया धरती पर फिर भी, थी मैं हमेशा लाचार।।

मेरे आने की खबर सुनकर, बहुत दुखी था मेरा परिवार।।
मां पर उठ रहे थे कई सवाल, घर में हो गया था एक बवाल।।

बचपन जाने कहां खो गई, नहीं मिला कभी परिवार का प्यार।।
बरस रही थी मेरी आंखें, होता देख ये अत्याचार।।

घूंघट बनी ज़ंज़ीर

घूंघट प्रथा के पर्दो में।
लिपटी है सभी औरतें।।
घूंघट न उठा पाती।
समाज के डर से।।
सुंदर दृश्य न देख पाती।
घूंघट के अंधकार से।।

फिर भी गांव में खुशियां होती हैं

ग्रामीण जीवन में समस्याएं होती हैं।
फिर भी जीवन में खुशियां होती हैं।।

न शोर शराबा होता है।
न मिलावटी जीवन है।
गम में भी खुशियां बेशुमार होती हैं।।

मेरा सपना

सबका होता है एक सपना, जो होता है उसका अपना,
सपना तो एक मेरा भी है, पूरा करना जो मुझे यही है,
कलम पकड़ी थी मैंने हाथों में, वह करके कुछ ज़ज्बातों में, उस कलम को ही अपना सपना बना लिया, उसी में अपना जीवन छुपा लिया।।

कहना था कुछ, पर कहती किससे, इसलिए मैनें दोस्ती कर ली इससे,
इससे अच्छा दोस्त मुझे मिलता कहा, और कौन है किसका यहां।।

अपने मन की सब लिख दी, इसी से बजाय कहने के यहाँ, और किसी से लिखते लिखते मुझे याद आया, जो रुक कर पाया, जो कविता रुप पाया।।

पीरियड्स लज्जा नहीं

यह तो है प्रकृति की देन।
मत समझो इसे लज्जा की देन।।

इन दिनों सब पीड़ा वह सह लेती।
फिर भी चेहरे पर उसके एक मुस्कान सी रहती है।।

छुप छुप कर उसे रहना पड़ता है।
इन दिनों उसे क्या क्या नही उसे सहना पड़ता है ।।

महावारी हो तो मंदिर मस्जिद मत जाना ।
घर से बाहर ही मत आना।।

माँ की ममता

घुटनों से रेंगते-रेंगते
कब पैरों पर खड़ी हुई
तेरी ममता की छांव में
जाने मैं कब बड़ी हो गई

काला टीका दूध मलाई
आज भी सब कुछ वैसा है
मैं ही मैं हूं हर जगह
प्यार ये तेरा कैसा है

‘अफवाहों से जन्मी ये’

सही करो फिर भी दुनिया क्यों देती है मुझको ये इल्जाम
नजरिया गलत तो दुनिया का है, मैं क्यों छोड़ दूं अपना काम।।

अफवाहे-ताने सुनते हुए भी, मै नहीं रुकी चलते चलते,
अफवाहों से जन्मी ये आग भी, अब थक गई जलते-जलते।।

बाधा डालना दुनिया का काम, मै करुंगी वही जो मन चाहे, दुनिया वालों ये मेरी किसमत ले जाएगी वही जहां है।।