Project Disha – APF Hindi

अभिव्यक्ति: लड़कियों के प्रति अन्यायपूर्ण विचार

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक के लमचूला गांव में आज भी लड़का और लड़की के प्रति भेदभाव गहराई से अपनी जड़े जमाए हुए है. यहां न केवल लिंग के आधार पर बल्कि काम के आधार पर भी लड़का और लड़की के बीच भेदभाव किया जाता है. लड़कियों को शिक्षा जैसे मौलिक अधिकारों से वंचित कर घरेलू कामों को सीखने पर मजबूर किया जाता है. पितृसत्तात्मक समाज इस बात पर ज़ोर देता है कि घर का काम लड़की को और नौकरी करने का अधिकार केवल लड़कों को है.

ग्रामीण भारत की सशक्त किशोरियां

उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के एक दूरदराज के गांव में एक कमरे में बैठी किशोरियों के एक समूह ने मुझसे पूछा, “अपने बारे में हमें बताइए.” मैंने उनसे पूछा “आप क्या जानना चाहती हैं?” मैं उनसे अपनी उम्र या वैवाहिक जीवन के बारे में प्रश्न की उम्मीद कर रही थी जो अक्सर मुझसे पूछे जाते हैं. लेकिन मुझे सुखद आश्चर्य हुआ क्योंकि 10 साल से अधिक के अपने अनुभव में पहली बार मुझसे फील्ड में आने वाली चुनौतियों के बारे में पूछा गया, जैसे कि ‘जब मैं उनकी उम्र की थी, तो लड़की होने के कारण मेरे सामने क्या क्या चुनौतियां आती थीं और मैं उसका सामना कैसे करती थी?’ यही कारण था कि मुझे उनका जवाब देने में कुछ समय लगा. सवाल करने वाली समूह की इन सभी लड़कियों की उम्र 11 से 20 साल के बीच थी.

गांव की पहुंच से बाहर है नेटवर्क

देश में 5जी को लेकर तैयारियां जोरों शोरों से चल रही है. माना जा रहा है कि इससे इंटरनेट की रफ़्तार को पंख लग जाएगा. कनेक्टिविटी में जहां बेहतरी आएगी वहीं किसी भी चीज़ को डाउनलोड करना चुटकियों का काम हो जाएगा. इसे दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति मानी जा रही है. इसके माध्यम से देश जहां नए युग में प्रवेश की तैयारी कर रहा है वहीं इस देश में कई ऐसे दूर दराज़ के क्षेत्र हैं जहां नेटवर्क की सुविधा नाममात्र की है. पहाड़ी क्षेत्र उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित कपकोट ब्लॉक का पोथिंग गांव इसका उदाहरण है. जहां नेटवर्क के हालात उपर्युक्त सभी दावों से कोसों दूर है. इस गांव के लोग आज भी अपने क्षेत्र में 5G की बात तो दूर, मामूली नेटवर्क को तरस रहे हैं. 

सामाजिक अन्याय और रूढ़िवादी सोच में दबा है पहाड़ी गांवों का भविष्य

जिन समस्याओं को लेकर हम इतना आशवस्त हो चुके हैं कि उनके मुद्दे अब हमारे लिए ख़त्म हो गए हैं, उन समस्याओं ने ही उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ी जिले बागेश्वर के गांवों में न जाने कितने सपनो और आकांक्षाओं को दबा रखा है. बागेश्वर, जो 1997 से पहले अल्मोड़ा जिले का हिस्सा हुआ करता था, विकास की रफ़्तार को तेज़ी देने के लिए इस नए जिले को 3 विकास खंडों बागेश्वर, गरुड़ और कपकोट में विभाजित किया गया. लेकिन दो दहाई से अधिक समय बीतने के बाद भी यह जिला काफी समस्याओं से जूझ रहा है. गरुड़ विकास खंड के एक गांव चोरसो की रहने वाली लड़कियां विकास और समाज की अवधारणा के बारे में बात करते हुए कहती हैं कि उन्हें अपने सपनों को पूरे करने के अवसर ही नहीं मिलते

नहीं बदला है घरेलू हिंसा का स्वरूप

21वीं सदी का वैज्ञानिक युग कहलाने के बावजूद ऐसा कोई दिन नहीं गुज़रता है जब देश के समाचारपत्रों में महिला उत्पीड़न विशेषकर घरेलू हिंसा की ख़बरें प्रकाशित नहीं होती हैं. हाई सोसाइटी से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक महिलाओं के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न के मामले सामने आते रहते हैं. मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ी राज्यों तक यह सिलसिला जारी है. ऐसे ही बहुत से मामले पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में भी देखने को मिलते हैं.

रास्ते भर रास्ता ढूंढते हैं 

देश में इस वर्ष मानसून लगभग अपने सामान्य गति से चल रहा है. कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश ने जन जीवन को काफी प्रभावित किया है. हालांकि मानसून का आना देश में सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. लेकिन अति वर्षा से कई इलाकों में बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण स्थानीय नागरिकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों के लिए आर्थिक रूप से मानसून अहम तो है लेकिन इससे उनकी दैनिक दिनचर्या सबसे अधिक प्रभावित होती है. अत्यधिक वर्षा से ग्रामीण क्षेत्र अन्य इलाकों से कट कर रह जाते हैं. इसकी मुख्य वजह सड़क का नहीं होना है. कच्चे और फिसलन भरे रास्तों पर चलना दूभर हो जाता है.

महिलाओं के खिलाफ रंगभेद की मानसिकता

सुंदरता के पैमाने से जुड़ी गलत धारणाएं आज भी हमारे समाज में जिंदा है. जहां सुंदरता को रंग के साथ जोड़ दिया जाता है फिर वह रंगभेद बन जाता है. लेकिन हमारे देश में रंगभेद को लिंग भेद के साथ जोड़ कर और भी खतरनाक बना दिया जाता है. विदेशो में काला रंग स्त्री व पुरुष दोनों को एक समान परिभाषित करता है. लेकिन भारत में इसे सिर्फ स्त्री से जोड़ कर देखा जाता है. विज्ञान और तकनीक के इस युग में भी यह मनोस्थिति समाज में गहराई से अपनी जड़ें जमाये हुए है. समाज में गोरा रंग ही सुंदरता का वास्तविक पैमाना माना जाता है जबकि वास्तविकता यह नहीं है. रंग का सुंदरता का कोई मतलब नहीं है. लेकिन आज किसी महिला या लड़की के गुणों को ताक पर रख कर उसके रंग को महत्ता दी जाती है.

प्रथा के नाम पर महिलाओं का शोषण

प्रथा के नाम पर महिलाओं को शोषित किये जाने वाली सोच को समाप्त करने के लिए सरकार ने न जाने कितने कदम उठाए, परंतु यह समाप्त होने का नाम नहीं ले रही है. इन्हीं में एक घूंघट और पर्दा प्रथा भी है. इज़्ज़त के नाम पर महिलाओं को पर्दे में जकड़ने वाली यह प्रथा सदियों से चली आ रही है. संकुचित सोच वाली इस प्रथा को पितृसत्तात्मक समाज आज भी गौरव के साथ महिमामंडन करता है. यूं तो यह प्रथा राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा आदि राज्यों में अधिक देखने को मिलती है, परंतु पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के कई गांवों में भी यह प्रथा प्रचलित है. समाज का एक बड़ा तबका इस प्रथा का समर्थन करता है. आज भी इन क्षेत्रों के पुराने बुजुर्ग इस प्रथा का समर्थन करते नज़र आते हैं.

मैदान के बिना कैसे होगा अभ्यास?

हरियाणा में जारी खेलो इंडिया यूथ गेम्स में युवा खिलाडियों का शानदार प्रदर्शन जारी है. सुखद बात यह है कि इसमें लड़कों के साथ साथ लड़कियां भी विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिखा रही हैं और अपने अपने राज्यों के लिए पदकों की झाड़ियां लगा रही हैं. खेलो इंडिया के माध्यम से केंद्र सरकार का युवाओं को अपने खेल प्रदर्शन के लिए मंच उपलब्ध करवाना एक सराहनीय प्रयास है. इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने के लिए भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी उभर कर सामने आएंगे. वास्तव में पढ़ाई के साथ साथ खेल भी जीवन का अमूल्य हिस्सा है. जिससे बच्चों का शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों से विकास होता है. यही कारण है कि केंद्र सरकार जगह जगह अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस स्पोर्ट्स सेंटर बना रही है ताकि खेलों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने वाले बच्चे और युवाओं को अभ्यास की सभी सुविधा उपलब्ध हो सके.

पितृसत्ता के बोझ तले दबी है स्त्री

भारतीय समाज एक पुरुष प्रधान समाज रहा है, जहां पुरूषों को महिलाओं की तुलना में ज्यादा अधिकार दिए गए हैं. पितृसत्तात्मक समाज के अंतर्गत भारतीय समाज में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से श्रेष्ठता दी गई है. इसमें हमेशा से पुरूषों का वर्चस्व रहा है. हालांकि समय समय पर महिलाओं ने अपनी हुनर, काबलियत और मेहनत से यह साबित किया है कि वह किसी भी रूप में पुरुषों से कम नहीं है और समाज को उसे भी बराबरी का अवसर और सोच प्रदान करनी चाहिए. ज़मीन से लेकर अंतरिक्ष तक महिलाओं ने सुनहरे अक्षरों में अपनी सफलता की गाथा लिख दी है. लेकिन इसके बावजूद 21वीं सदी के इस दौर में भी उसे अपने मौलिक अधिकारों के लिए भी संघर्ष करनी पड़ रही है.

मूलभूत सुविधा भी नहीं है गांव के स्कूलों में

आज़ादी के बाद से ही देश में शिक्षा का स्तर बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चलाई गई हैं. मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम लागू किया गया, समग्र शिक्षा अभियान चलाया गया, स्कूलों में मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था की गई, बच्चों के लिए मुफ्त ड्रेस और किताबों की व्यवस्था की गई, स्कूल चले हम और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे नारे लगाए गए. लेकिन हर बार कैग की रिपोर्ट में कहीं न कहीं सरकारी स्कूलों में शिक्षा का गिरता स्तर और बच्चों का स्कूल से दूर होना ही आता रहा है. यह कमियां दक्षिण की तुलना में उत्तर भारत और खासकर हिंदी भाषी प्रदेशों में अधिक देखने को मिलती है.

गांव को खुले में शौच मुक्त बनाने का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ है

आज़ादी के बाद हमारे देश ने कई मुद्दों पर तेज़ी से तरक्की किया है. कम समय में हम जहां अनाज के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन गए वहीं बड़े बड़े बांध और आधुनिक सुविधाओं से लैस अस्पताल का निर्माण कर हमने विश्व में अपनी काबलियत का लोहा मनवाया है. लेकिन विकास की इस यात्रा में हमने खुले में शौच की प्रवृत्ति को दूर करने में वक्त लगा दिया. दरअसल पूर्ववर्ती सरकारों ने इस मुद्दे को कभी गंभीरता से नहीं लिया जबकि यह स्वास्थ्य और स्वच्छ वातावरण के लिए लाज़मी था. हालांकि अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण का ख्याल रखना हम सब की समान जिम्मेदारी है. ऐसे खुले में शौच करना न सिर्फ हमें बीमार करता है, बल्कि हमारे आसपास के वातावरण को भी दूषित करता है.

इंटरनेट के दौर में पीछे रह गया गांव

संचार क्रांति के इस दौर में आज जब भारत 5जी की टेस्टिंग के अंतिम चरण में पहुंच चुका है और अब 6जी की ओर कदम बढ़ा रहा है, हर तरफ नेटवर्क का जाल बिछा हुआ है, शहर ही नहीं गांव गांव तक ब्रॉडबैंड का कनेक्शन पहुंचाया जा रहा है, टेक्नोलॉजी के ऐसे युग में हमारे देश में कुछ ग्रामीण क्षेत्र भी हैं जो नेटवर्क कनेक्टिविटी जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं. जहां लोगों को अपनों से फोन पर बात करने के लिए भी घर से 5 से 7 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. यह हकीकत देश के कई ग्रामीण क्षेत्रों के साथ साथ उत्तराखंड के दूर दराज़ के गांवों में भी देखने को मिल रहा है. एक तरफ जहां लॉकडाउन के समय देश के बच्चे ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से आसानी से अपनी शिक्षा पूरी कर रहे थे, तो वहीं पहाड़ी क्षेत्र उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक के लमचूला गांव के बच्चे नेटवर्क नहीं होने के कारण इस दौरान लगभग शिक्षा की लौ से कोसों दूर थे. 

गांव में स्कूल नहीं होने का दर्द

शिक्षा किसी भी समाज के बौद्धिक विकास की पहली कड़ी होती है. कोई भी देश अपने नागरिकों को शिक्षित किये बिना सभ्य और विकसित नहीं बना सकता है. आज विज्ञान में जो भी तरक्की हुई है, उसके पीछे कड़ी शिक्षा का ही परिणाम है. इसीलिए कोई भी देश अपनी नीतियों को बनाते समय शिक्षा को विशेष प्राथमिकता देता है. हमारे देश में भी आज़ादी के बाद से शिक्षा को ही केंद्र बिंदु रखा गया है. शहरी क्षेत्रों के बच्चों की तरह गांव के बच्चों को भी शिक्षा में समान अवसर मिले, इसके लिए अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा की नीतियां लागू की गयी ताकि आर्थिक रूप से पिछड़े और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े परिवार के बच्चे को भी शिक्षित होने का अवसर प्राप्त हो सके.

कब साकार होगा आदर्श गांव का सपना?

आदर्श ग्राम की संकल्पना महात्मा गांधी ने आजादी से पहले अपनी किताब “हिन्द स्वराज” में की थी. जिसमें उन्होंने आदर्श गांव की विशेषता बताई थी और उसे मूर्त रूप देने की कार्य योजना की भी चर्चा की थी. गांधी के सपनों का गांव आज तक बन तो नहीं सका लेकिन समय-समय पर इसकी योजनाएं जरूर बनाई गई हैं. लोहिया ग्राम, अंबेडकर ग्राम और गांधी ग्राम जैसी कई योजनाएं हैं, जो आदर्श ग्राम बनाने का दावा करती हैं. लेकिन यह धरातल पर कितना साकार हुआ है, यह किसी से छुपा नहीं है.

अंधविश्वास से जूझ रहा ग्रामीण क्षेत्र

21वीं सदी के भारत को विज्ञान का युग कहा जाता है, जहां मंगलयान से लेकर कोरोना के वैक्सीन को कम समय में तैयार करने की क्षमता मौजूद है. लेकिन इसके बावजूद इसी देश में अंधविश्वास भी समानांतर रूप से गहराई से अपनी जड़ें जमाया हुआ है. देश के शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास का प्रभाव अधिक देखा जाता है. जहां अनजाने में ही लोग मान्यताएं और संस्कृति के नाम पर अंधविश्वास का शिकार हो जाते हैं. शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण ही ऐसे मामले सामने आते हैं. दरअसल अंधविश्वास का मूल कारण व्यक्ति के अंदर का डर होता है. जिसकी वजह से वह खुद को इस जाल में फसने से रोक नहीं पाता है.

लड़के लड़कियों में भेदभाव क्यों करता है समाज?

केन्द्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी सर्वेक्षण 2021 के आंकड़ों के अनुसार पहली बार देश में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक हुई है. सर्वेक्षण के अनुसार प्रति हजार लड़कों पर 1020 लड़कियां हैं. माना यह जा रहा है कि आजादी के बाद यह पहली बार है जब देश में लड़कियों की संख्या न केवल एक हजार को पार कर गई बल्कि लड़कों से अधिक हो गई है. भारत के जनसांख्यिकीय बदलाव का यह सुखद संकेत है.

अस्पताल की समस्या से जूझ रहा पहाड़ का गांव

उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के शुरुआती चार महीने के बजट के लिए लगभग 21 हज़ार करोड़ से अधिक का लेखानुदान पारित किया. जिसमें स्वास्थ्य, चिकित्सा और परिवार कल्याण पर एक हज़ार करोड़ रूपए से अधिक खर्च करने की बात कही गई है. इससे पूर्व केंद्र सरकार ने भी राज्य के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत बनाने के लिए 1736 करोड़ रूपए से अधिक की मंज़ूरी दी है.

महिला सशक्तिकरण में पिछड़ता भारत का गांव

21वीं सदी का भारत तकनीकी रूप से जितनी प्रगति कर रहा है, महिलाओं तथा लड़कियों के खिलाफ भेदभाव भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ रहा है. महिलाएं हर जगह किसी न किसी रूप में इसका शिकार हो रही हैं. चाहे शहर हो या गांव, मोहल्ला हो या हाई सोसाइटी अथवा बाजार हो या घर की चारदीवारी, अपने हो या पराये, सभी से भेदभाव का शिकार होती हैं. शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों दोनों ही जगह यह समस्या एक समान है. अंतर केवल इतना है कि जागरूकता के कारण शहरों में ऐसे मुद्दे सामने आ जाते हैं.

महिलाओं पर अत्याचार का सिलसिला रुका नहीं है

नारी एक ऐसी ईश्वरीय कृति है जिसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है. स्त्री मातृत्व की देवी होने के साथ ही पुरुष की पूरक भी है. समाज की संरचना में उसका योगदान पुरुष से कहीं अधिक माना जाता है. यही कारण है कि ग्रंथों में उसका दर्जा मर्द से ऊपर रखा गया है. जिस स्वर्ग को पाने के लिए ऋषि मुनि तपस्या करते हैं उसे मां रुपी नारी के क़दमों में रख दिया गया है. इतना महत्वपूर्ण स्थान होने के बावजूद समाज अक्सर स्त्री को वह सम्मान नहीं देता है.

गांव के विकास के लिए सड़क ज़रूरी है

केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी थी, उस समय विकास के जिन क्षेत्रों पर फोकस किया गया था, उनमें सड़क भी महत्वपूर्ण थी. इसी सरकार में पहली बार सड़कों के विकास पर गंभीरता से ध्यान दिया गया. एक तरफ जहां स्वर्णिम चतुर्भुज के माध्यम से महानगरों को आपस में जोड़ा गया तो वहीं दूसरी ओर गांव तक सड़कों की हालत सुधारी गई. परिणामस्वरूप देश के गांवों का तेज़ी से विकास हुआ. इससे शहरों तक पहुंचना बहुत आसान हो गया.

लड़कियों के अधिकार कहां है?

हाल ही में संपन्न हुए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अपने संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला शक्ति को नमन करते हुए महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए अपनी सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार सम्मान और अवसरों पर विशेष ज़ोर के साथ अपनी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से महिला सशक्तिकरण पर विशेष ज़ोर देती रहेगी. इसके साथ साथ उन्होंने महिलाओं के स्वावलंबन के लिए हर स्तर पर प्रयास करने पर भी ज़ोर दिया ताकि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं और अधिकार उन्हें प्राप्त हो. इसमें कोई शक नहीं कि केंद्र से लेकर सभी राज्य सरकार महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास करती रहती हैं. इसके अंतर्गत कई योजनाओं संचालित की जा रही हैं.

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए सुविधा भी ज़रूरी है

वित्त वर्ष 2022-23 के लिए बजट प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शिक्षा पर खर्च के लिए एक लाख 4 हज़ार 277 करोड़ रूपए देने की घोषणा की. जिसमें 63,449 करोड़ रूपए स्कूली शिक्षा पर खर्च किये जायेंगे. जबकि उच्च शिक्षा पर खर्च के लिए 40,828 करोड़ रूपए आवंटित किये गए हैं. इसके अतिरिक्त वित्त मंत्री ने सार्वभौमिक शिक्षा के लिए समग्र शिक्षा अभियान के तहत करीब 37,383 करोड़ रूपए आवंटित किया है. इससे कोरोना महामारी के कारण स्कूलों के बंद होने से छात्रों को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने में मदद मिलेगी.

खुद बीमार है पहाड़ का अस्पताल

इस वर्ष के केंद्रीय बजट में ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने पर भी काफी ज़ोर दिया गया है. एक ओर जहां क्रिटिकल केयर अस्पताल खोलने की बात की गई है, वहीं 75 हज़ार नए ग्रामीण हेल्थ सेंटर खोलने की भी घोषणा की गई है. इससे न केवल ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने में सुविधा मिलेगी बल्कि शहर के अस्पतालों पर भी बोझ कम पड़ेगा. दरअसल कोरोना की दूसरी लहर की त्रासदी के बाद से देश में स्वास्थ्य ढांचा को मज़बूत करने पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है.

कोरोना से गांव में रोज़गार का संकट

कोरोना की तीसरी लहर का प्रकोप अब धीरे धीरे कम होने लगा है. हालांकि अच्छी बात यह है कि दूसरी लहर की अपेक्षा तीसरी में इंसानी जानों की हानि कम रही. न तो अस्पतालों में ऑक्सीजन की मारामारी रही और न ही वेंटिलेटर की कमी का सामना करना पड़ा. दरअसल 2020 में कोरोना ने आपदा के रूप में दुनिया में ऐसी दस्तक दी, कि लोगों की जिंदगी तहस नहस हो गई.

पितृसत्तात्मक समाज में अधिकार के लिए संघर्ष करती महिलाएं

पिछले महीने देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में पिता की संपत्ति पर बेटियों के अधिकार को लेकर आदेश सुनाया. कोर्ट के अनुसार पिता की संपत्ति पर बेटों के साथ साथ बेटियों का भी बराबर का अधिकार होगा. अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति मरने से पहले अपना कोई भी वसीयत नहीं लिखवाता है

नेटवर्क की समस्या भी चुनावी मुद्दा है?

देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां चल रही हैं उनमें पहाड़ी राज्य उत्तराखंड भी शामिल है. जहां 14 फरवरी को वोट डाले जायेंगे. ऐसे में मतदाताओं को अपने अपने पक्ष में करने के लिए सभी पार्टियां एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रही हैं. पिछले चुनावों की तरह इस बार भी विकास प्रमुख मुद्दा रहेगा क्योंकि गठन के 21 साल बाद भी उत्तराखंड विकास के कई पैमानों पर अन्य राज्यों की अपेक्षा पिछड़ा हुआ है.

अस्पताल की कमी से जूझता गाँव

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 21वीं सदी के डिजिटल इंडिया में ऐसा भी एक गांव है, जहां बीमार मरीज़ के पेट के दर्द को दूर करने के लिए लोहे की गर्म छड़ का इस्तेमाल किया जाता हैं. इसके अतिरिक्त कई अन्य बीमारियां हैं, जिनका देसी इलाज के नाम पर इसी प्रकार के अवैज्ञानिक माध्यमों से किया जाता है. ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि उस गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है.

स्वच्छ जल के लिए संघर्ष करता गांव

वर्ष 2024 तक देश के 19 करोड़ घरों तक पीने का साफ़ पानी पहुंचाने का केंद्र सरकार का लक्ष्य हर उस भारतीय के लिए उम्मीद की एक किरण है जो आज भी पीने के साफ़ पानी से वंचित हैं. विशेषकर उन ग्रामीण महिलाओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा, जिनका आधा जीवन केवल पानी लाने में ही बीत जाता है. भले ही शहरों में नल के माध्यम से घर घर तक पीने का साफ़ पानी उपलब्ध हो, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी यह सुविधा किसी ख्वाब से कम नहीं है.

माहवारी में सामाजिक कुरीतियों का दर्द सहती किशोरियां

किसी भी देश का डिजिटल रूप से लैस और तकनीकी रूप से विकसित होना 21वीं सदी की खासियत है. आकाश से लेकर पाताल तक की गहराइयों को नाप लेने की क्षमता भारत ने भी विकसित कर ली है. यही कारण है कि भारत के वैज्ञानिकों और तकनीकी रूप से दक्ष लोगों की दुनिया भर में डिमांड है. सोशल मीडिया के लगभग सभी बड़े प्लेटफॉर्म की कमान भारतियों के हाथों में नज़र आती है. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि इतनी उपलब्धियां पाने के बाद भी आज लोगों के जेहन से हम माहवारी जैसे विषय में बनी गलत अवधारणाएं मिटा नहीं सके हैं.

ज़ंजीरों को तोड़ना जानती हैं लड़कियां

देश के इतिहास में पहली बार एक हज़ार से अधिक लड़कियों ने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी यानि एनडीए की परीक्षा पास कर अपने जज़्बे और हुनर को साबित कर दिया है. उन्होंने यह संदेश भी दे दिया कि यदि अवसर मिले तो वह हर उस क्षेत्र में अपना लोहा मनवा सकती हैं जिसे केवल पुरुषों के लिए ख़ास समझा जाता है. हालांकि एनडीए में उनका प्रवेश इतना आसान नहीं था.

गांव में विकास की ज़रूरत है

देश ने 100 करोड़ वैक्सीन लगाने का इतिहास रच दिया है. इस लक्ष्य को पूरा करने में जिन राज्यों ने अभूतपूर्व योगदान दिया, उसमें उत्तराखंड भी प्रमुख है. इस इतिहास को रचने से पूर्व ही उत्तराखंड ने अपने सभी नागरिकों को कम से कम एक डोज़ देने का शत प्रतिशत लक्ष्य पूरा कर लिया था. वास्तव में देश के विकास में उत्तराखंड का हमेशा से विशेष योगदान रहा है.

संख्या नहीं अवसर से आगे बढ़ेगी लड़कियां

पिछले सप्ताह केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े में बताया गया है कि देश में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या अधिक हो गई है. सर्वेक्षण के अनुसार प्रति एक हज़ार पुरुषों पर 1020 महिलाएं हैं. माना यह जा रहा है कि आज़ादी के बाद यह पहली बार है जब देश में महिलाओं की संख्या एक हज़ार को पार कर गई है.