Charkha Feature Hindi – 2022

सस्ते तकनीक से ढूंढ लिया रोज़गार का साधन

देश में बेरोजगारों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं. चारों तरफ रोजगार के लिए मारामारी है. प्राइवेट सेक्टर से लेकर सरकारी विभाग तक शिक्षित बेरोजगारों की बड़ी तदाद नौकरी के लिए भटक रही है. बावजूद इसके उन्हें नौकरी तो नहीं मिलती उलटे निराशा, अवसाद, कुंठा, हीनता के शिकार ज़रूर  हैं. कोरोना के बाद बहुत सी कंपनियों ने आर्थिक संकट के कारण बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छटनी कर दी है. ऐसे में नौकरी ढूंढना मुश्किल का काम हो गया है. रोज़गार छिनने के बाद प्रदेश लौटे कुछ युवाओं ने अपने आसपास ही रोजगार करने का निश्चय किया है. उन्होंने हिम्मत और हौसले से व्यापार की नींव डाली और शुरू हो गया रोजगार का नया अध्याय.

कब रुकेगा दुष्कर्म का सिलसिला?

यूपी के लखीमपुर में अनुसूचित जाति की दो नाबालिग बहनों के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि नारी आज भी सुरक्षित नहीं है. घर की चारदीवारी से लेकर बाहर तक विकृत मानसिकता के दरिंदे बेख़ौफ़ घूम रहे हैं और किसी भी नारी को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं. दरिंदगी की सीमा इस तरह की पार कर चुके हैं कि 70 साल की बुज़ुर्ग से लेकर दो साल की मासूम तक सुरक्षित नहीं है. न तो गांव सुरक्षित है और न ही दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में महिलाओं की इज़्ज़त महफूज़ है. आज़ादी के बाद से लेकर आज तक कोई ऐसा दिन नहीं है जब देश का कोई समाचारपत्र बलात्कार की ख़बरों के बिना प्रकाशित हुआ हो.

सस्ते तकनीक से ढूंढ लिया रोज़गार का साधन

देश में बेरोजगारों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं. चारों तरफ रोजगार के लिए मारामारी है. प्राइवेट सेक्टर से लेकर सरकारी विभाग तक शिक्षित बेरोजगारों की बड़ी तदाद नौकरी के लिए भटक रही है. बावजूद इसके उन्हें नौकरी तो नहीं मिलती उलटे निराशा, अवसाद, कुंठा, हीनता के शिकार ज़रूर  हैं. कोरोना के बाद बहुत सी कंपनियों ने आर्थिक संकट के कारण बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छटनी कर दी है. ऐसे में नौकरी ढूंढना मुश्किल का काम हो गया है. रोज़गार छिनने के बाद प्रदेश लौटे कुछ युवाओं ने अपने आसपास ही रोजगार करने का निश्चय किया है. उन्होंने हिम्मत और हौसले से व्यापार की नींव डाली और शुरू हो गया रोजगार का नया अध्याय. जबकि कुछ पढ़े-लिखे युवा खेती व मजदूरी की ओर लौट रहे हैं.

महिलाओं के लिए संगीत की राह आसान बनाती रंजना

हर साल लगभग 3 करोड़ लोग विभिन्न तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेते हैं मगर ऐसा जरूरी नहीं है कि हर शख्स इसमें तरक्की ही प्राप्त करे, हालांकि अधिकांश घरों में लोग अपने बच्चों को भी अफसर बनने की राह पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे होंगे, लेकिन हर शख्स की चाहत एक-सी हो, ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है. इसलिए हर किसी को अपने अंदर की विशेषताओं पर काम करना चाहिए ताकि वो अपने हुनर को निखार सके. कुछ ऐसा ही काम मुजफ्फरपुर, बिहार की रहने वाली रंजना झा कर रही हैं.

संजॉय घोष मीडिया अवार्ड 2022 की घोषणा

सामाजिक मुद्दों पर आधारित देश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के लेखकों के शोधपरक आलेख को मंच प्रदान करने वाले प्रतिष्ठित ‘संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स – 2022″ की घोषणा चरखा डेवलपमेंट कम्युनिकेशन नेटवर्क, दिल्ली द्वारा कर दी गई है. निर्णायक समिति (जूरी) के निर्णय पर आधारित इन पुरस्कारों का उद्देश्य ग्रामीण समुदायों की किशोरियों और महिलाओं को सशक्त बनाने में मीडिया की भूमिका के साथ प्रतिबद्ध लेखकों के काम को प्रोत्साहित करना है.यह पुरस्कार चरखा के संस्थापक संजॉय घोष से प्रेरित है, जिन्होंने मीडिया के रचनात्मक उपयोग के माध्यम से हाशिए के ग्रामीण समुदायों के सामाजिक और आर्थिक प्रगति की दिशा में काम किया है. दो दशक पहले शुरू किया गया यह पुरस्कार, लेखकों के एक ऐसे समूह को तैयार करता है.

ग्रामीण भारत की सशक्त किशोरियां

उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के एक दूरदराज के गांव में एक कमरे में बैठी किशोरियों के एक समूह ने मुझसे पूछा, “अपने बारे में हमें बताइए.” मैंने उनसे पूछा “आप क्या जानना चाहती हैं?” मैं उनसे अपनी उम्र या वैवाहिक जीवन के बारे में प्रश्न की उम्मीद कर रही थी जो अक्सर मुझसे पूछे जाते हैं. लेकिन मुझे सुखद आश्चर्य हुआ क्योंकि 10 साल से अधिक के अपने अनुभव में पहली बार मुझसे फील्ड में आने वाली चुनौतियों के बारे में पूछा गया, जैसे कि ‘जब मैं उनकी उम्र की थी, तो लड़की होने के कारण मेरे सामने क्या क्या चुनौतियां आती थीं और मैं उसका सामना कैसे करती थी?’

टूटी नहर से चिंतित किसान

हम सब इस बात से भली भांति परिचित हैं कि भारत एक क़ृषि प्रधान देश है. जहां लगभग 60 से 70 प्रतिशत लोग क़ृषि पर निर्भर हैं. देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का एक बड़ा हिस्सा है. लेकिन उन्नत कृषि के लिए सबसे ज़रूरी पानी है. जिसकी कमी से इस क्षेत्र को सबसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है. यही कारण है कि आज़ादी के बाद भी सभी सरकारों ने इस ओर गंभीरता से ध्यान दिया है. हर खेत तक पानी पहुंचाने के लिए नहरें बनवाई गईं और जहां पहले से निर्मित थी उसका पुनरुद्धार किया गया. लेकिन बढ़ते औद्योगिकीकरण के कारण पिछले कुछ दशकों में सरकार का ध्यान इस क्षेत्र से पहले की अपेक्षा कम होती जा रही है. जिसके कारण कृषि क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है. 

विदेश में पढ़ने के बाद हर्षित ने शुरू की एवोकाडो नर्सरी

भारत को युवाओं का देश कहा जाता है. आंकड़ों के लिहाज से भारत दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है. इतनी बड़ी आबादी जब कुछ नया सोचती है और उस पर अमल करने लगती है तो देश की तरक्की के लिए यह शुभ संकेत होता है. मप्र की राजधानी भोपाल का हर्षित गोधा इन्हीं युवाओं में से एक है. जिसने यूके से बीबीए की पढ़ाई के दौरान ही खेती-किसानी के लिए अपना स्टार्टअप शुरू करने का मन बनाया.

उत्तराखंड में ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सुविधा की दुर्दशा

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड का गठन हुए 21 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं. परन्तु आज भी यहां के ग्रामीण क्षेत्रों के लोग छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी मैदानी जिलों के अस्पतालों पर निर्भर हैं. राज्य में डॉक्टरों की कमी व आधुनिक सुविधाओं का अभाव 2021-22 के बजट से उजागर हो जाता है. जिसके अनुसार राज्य के स्वास्थ्य विभाग में 24451 राजपत्रित और अराजपत्रित पद स्वीकृत हैं. इनमें 8242 पद रिक्त हैं जो स्वीकृत पदों का 34 प्रतिशत है. रूरल हेल्थ स्टेटिस्टिक्स रिर्पोट 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार

जोश और जज्बे के साथ क्रिकेट खेलती दृष्टिबाधित लड़कियां

इन दिनों केंद्र सरकार द्वारा आयोजित खेलों इंडिया का जुनून लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है. यह देश के कोने कोने में खेलने का जज़्बा रखने वाले हर उम्र के खिलाडियों को प्रेरित कर रहा है. दृष्टिबाधित लड़कियां भी इससे इतनी प्रेरित हुईं कि खेलों में अपना भविष्य तलाशने लगीं हैं. यह लड़कियां अब क्रिकेट खेलने का जोखिम उठा रही हैं. ये सिर्फ अपने गांव, शहर या राज्य में नहीं, बल्कि नेशनल टूर्नामेंट भी खेल चुकी हैं और अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टूर्नामेंट खेलने की तैयारी कर रही हैं. इन्हीं में से एक खिलाड़ी है मध्य प्रदेश के होशंगाबाद की प्रिया कीर.

स्मार्ट सिटी से पहले सोच को स्मार्ट बनाना ज़रूरी है

भारत में कई ऐसे बड़े शहर है जो स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल तो हैं, लेकिन जमीन पर वह स्मार्ट नज़र नहीं आता है. भारत सरकार की महत्वपूर्ण योजना स्मार्ट सिटी स्थानीय विकास को सक्षम और प्रौद्योगिकी की मदद से नागरिकों के बेहतर विकास, जीवन की गुणवत्ता में सुधार तथा आर्थिक विकास को गति देने के लिए एक नायाब पहल है. जिसके जरिए बुनियादी चीजों को नए सिरे से मजबूत और बेहतर करने की कोशिश है. इन सबके बीच कई शहर आज भी स्मार्ट नहीं हुए हैं. वजह साफ है कि किसी भी कार्य को संपन्न करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और तत्परता की जरूरत पड़ती है. बिहार के मुजफ्फरपुर शहर भले ही स्मार्ट बनने वाली सूची में है, परंतु ऐसा लगता है कि यहां अब तक स्मार्ट बनाने के सारे कवायद ठंडे पड़ रहे हैं. मुख्य सड़क से लेकर गली-मुहल्लें की सड़के बरसात में देखने लायक रहती है. पानी और कचरों के बीच प्रस्तावित स्मार्ट सिटी के लोग व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं. प्रमुख क्षेत्र भगवानपुर, बीबीगंज, माड़ीपुर, जूरन छपड़ा, स्टेशन रोड, मोतीझील, मिठनपुरा, कन्हौली, रामनगर

उम्र के आधे पड़ाव पर शिक्षा की लौ जगा रही महिलाएं

ऐसा माना जाता था कि पुराने जमाने की माएं नये जमाने के बच्चों के लिए आउटडेटेड हो चुकी हैं. लेकिन आज के दौर की माएं अपनी अलग-अलग परिस्थितियों तथा दायरों में रहते हुए भी अपनी कोशिशों से नये जमाने के साथ कदमताल मिलाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं. हमारे समाज में भी ऐसी कई महिलाएं हैं, जो मां बनने के बाद भी अपनी पहचान बना रही हैं. ना केवल एक गृहणी के तौर पर बल्कि शिक्षा जगत में भी बहुत मुखरता से अपने कदम बढ़ा रही हैं. पहले लोग मानते थे कि लड़की को केवल गुना-भाग करने लायक ही शिक्षित होना जरुरी होता है ताकि गेहूं, आटा, चावल या अन्य राशन का मोल लगा सके लेकिन अब बदलते दौर में महिलाओं ने इस सोच को पीछे छोड़ दिया है और केवल जोड़-घटाव की दुनिया से आगे निकलकर कलम को भी अपनी पहचान का जरिया बना रही हैं.

पर्यावरण संरक्षण से पहले जागरूकता ज़रूरी है

हाल ही में भारत सहित दुनिया भर में पर्यावरण दिवस पर अनेकों कार्यक्रम हुए. जिसमें पर्यावरण संरक्षण पर ज़ोर दिया गया और इस बात का प्रण किया गया कि न केवल जल और जंगल को हरा भरा किया जायेगा बल्कि जो जहां रहता है, वह वहीं के आसपास की जगहों को साफ़ रखने का प्रयास करेगा. इस बात को सुनिश्चित किया जाएगा कि रिहाइशी इलाकों में भी प्रकृति प्रदत्त उपहारों का संरक्षण किया जाएगा ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उसका लाभ उठा सके.

हुनर से बेजान गुड़ियों में फूंक रही हैं जान

बचपन में हम सबने गुड्डे-गुड़ियों का खेल खेला है. ऐसे भी छोटे-छोटे मनमोहक गुड्डे-गुड़ियों को देखकर सबका मन इसे दुलारने और हाथों में लेने के लिए उत्सुक हो जाता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए यह एक महज आकर्षण नहीं बल्कि अपनी पहचान बनाने का जरिया बन जाता है. इसे साबित किया है झारखंड की राजधानी रांची की रहने वाली शोभा कुमारी ने, जो करीब 14 वर्षों से गुड्डा-गुड़िया बनाने में जुटी हैं. शोभा बताती हैं कि गुड्डा-गुड़िया को जीवंत बनाने में केवल 14 साल की मेहनत नहीं है.

अब लड़कियां सपनों से समझौते नहीं करती हैं

21 वीं सदी के भारत में बहुत बदलाव आ चुका है. इसका प्रभाव देश के ग्रामीण क्षेत्रों में भी नज़र आता है. विशेषकर महिलाओं और किशोरियों के संबंध में यह बदलाव महत्वपूर्ण संकेत है. जहां पहले की अपेक्षा उनकी स्थितियों में बदलाव आ रहा है. पहले की अपेक्षा अब उन्हें अपने सपनों को पूरा करने की आज़ादी मिलने लगी है. शिक्षा के साथ-साथ खेलों के क्षेत्र में भी लड़कियों की भूमिका बढ़ने लगी है.

रेत के धोरों में जल की खोज

वैसे तो राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में विविध प्रकार के पानी के पारंपरिक जल स्रोतों का निर्माण समुदाय द्वारा किया गया है. क्षेत्र की सतही एवं भूगर्भीय संरचना बरसात की मात्रा के अनुसार किस प्रकार के जल स्त्रोत बनाए जा सकते हैं, यह ज्ञान उस जमाने में भी लोगों को था जब शिक्षा और तकनीक आज की तरह विकसित नहीं हुई थी. बरसात की बूंदों को सतह पर संजोने के साथ-साथ भू-गर्भ में पीने योग्य जल कहां मिल सकता है और कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इसका पता लगाने में कई पीढ़ियों का अनुभव रहा होगा. इसके अतिरिक्त सतही जल समाप्ति के बाद भू-गर्भ में प्रकृति द्वारा संजोये गये जल को ढूंढना और उपयोग कर जीवन को सतत चलाए रखने का भी अद्भुत अनुभव रहा होगा.

पर्यावरण को इंसान से सुरक्षा की ज़रूरत है

वर्ष 1972 से 2021 तक देश की जनसंख्या 581 मिलियन से 1393 मिलियन हो गयी. पिछले 50 वर्षो में देश की जनसंख्या का स्तर इस कदर बढ़ा कि उनकी जरूरतों ने पर्यावरण को झकझोर कर रख दिया. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपभोग और अंधाधुंध दोहन हुआ है. जिसका परिणाम मृदा निम्नीकरण, जैव विविधता में कमी, वायु और जल स्रोतों में प्रदूषण के रूप में दिखाई दे रहा है. अत्यधिक दोहन के कारण पर्यावरण का क्षरण हो रहा है जो मानव जाति और उसकी उत्तरजीविता के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है. पर्वतीय क्षेत्रों में तेज़ी से शहरीकरण की वजह से पर्यावरण का नाश हो रहा है.

बिजनेस में अपनी पहचान बनाती घरेलू महिलाएं

अक्सर यह माना जाता है कि शादी के बाद महिलाओं का करियर समाप्त हो जाता है क्योंकि घर और बच्चों से उसे फुर्सत ही नहीं मिलेगी कि वह अपने सपनों को पूरा करने के बारे में सोचे. लेकिन जैसे जैसे वक़्त बदल रहा है यह धारणा गलत साबित होती जा रही है. अब महिलाएं शादी के बाद भी बिजनेस जैसे क्षेत्र में अपने हुनर के जरिए पहचान बना रही हैं. इतना ही नहीं, अन्य महिलाओं को भी प्रोत्साहित कर रही हैं ताकि वह भी अपने हुनर को परवान दे सकें. इसकी मिसाल कुमारी किरण और शिखा रॉय जैसी कर्मवीर महिलाएं हैं. जिन्होंने न केवल शादी के बाद बिजनेस के क्षेत्र में कदम रखा और आज सफलतापूर्वक अपना व्यवसाय चला रही हैं बल्कि अन्य महिलाओं को भी ट्रेनिंग देकर उन्हें आर्थिक रूप से मज़बूत बना रही हैं.

मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़, कर रहे प्राकृतिक खेती

दिल्ली-एनसीआर, गुरुग्राम के प्रदूषित हवा से तंग आकर कुछ युवा अपने गांव वापस लौटकर न केवल प्राकृतिक खेती को अपना आजीविका का साधन बनाया बल्कि गांव के किसानों को भी इसी ओर प्रेरित कर रहे हैं. इनमें भोपाल के इंजीनियर शशिभूषण, पीएचडी फार्मा अनुज, सुधांशु और सुष्मिता और आईआईटी कानपुर, आईआईएम लखनऊ तथा इंफोसिस से पढ़ाई करने के बाद विदेश में नौकरी करने वाले संदीप सक्सेना के नाम उल्लेखनीय है. संदीप के प्रोफाइल में कई पुरस्कारों का उल्लेख है, इनमें  अटल बिहारी वाजपेई जी द्वारा सम्मानित होना उल्लेखनीय है. इंजीनियर शशि भूषण गुरुग्राम के अलावा बेंगलुरु, हैदराबाद जैसे शहरों में बड़ी कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं, लेकिन स्वास्थ्य के प्रति सजग होने के कारण वे बहुत जल्दी नौकरी छोड़कर गांव वापस आकर पुश्तैनी 25 एकड़ जमीन पर जैविक खेती करने लगे.

रेत पर अमरूद की खेती कर कृषि को नया आयाम देते किसान

खेती किसानी अर्थव्यवस्था का मेरुदंड है. प्रत्येक देश का विकास कृषि उत्पादन पर निर्भर है. महामारी के दौरान खेती किसानी ही भारत की बड़ी आबादी के लिए ईंधन का काम किया है. अच्छे मौसम की वजह से रबी और खरीफ फसलों का उत्पादन भी बेहतर हुआ है. यह जरूर है कि सब्जियों और फलों की बिक्री कुछ दिनों तक प्रभावित रही है लेकिन ग्रामीण इलाकों में में भुखमरी की स्थिति नहीं बनी. इस दौरान किसानों ने नकदी फसल और फलों की खेती के लिए प्रयास जारी रखा. परंतु कृषि विभाग की उदासीनता की वजह से किसानों को बीज, रासायनिक उर्वरक, पानी, बिजली आदि के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ी. महंगाई की मार झेल रहे किसानों के लिए खेतीबाड़ी आसान काम नहीं था.

सेहतमंद गांव से स्वस्थ भारत मुमकिन है

भारत ने जहां 21वी सदी में प्रवेश किया है वहीं ऐसा लगता है कि पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामो ने स्वास्थ्य सुविधाओं के मामलें में इसके विपरित 12वी सदी में प्रवेश किया है. राज्य के दूरस्थ इलाकों का धरातलीय सच शर्मसार करता है. यहां के दूर दराज़ क्षेत्रों में ऐसे कई अस्पताल हैं जहां डॉक्टरों की कमी के चलते या तो फार्मासिस्ट या फिर भगवान के भरोसे मरीजों का इलाज चल रहा है. अल्मोड़ा जनपद के अस्पतालों में जितने डाक्टर की आवश्यकता है उनके आधे अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

इनके बुलंद हौसले के सामने शारीरिक अक्षमता ने घुटने टेके

दिव्यांग होना कोई अभिशाप नहीं है लेकिन अगर कोई व्यक्ति इससे ग्रसित होता है, तो समाज और लोगों की मानसिकता उन्हें लेकर बिल्कुल अलग हो जाती है. वे उन्हें बोझ या दया की नजर से देखते हैं जबकि वे भी एक सामान्य परिवार में जन्म लेते हैं. लेकिन उनकी दिव्यांगता उन्हें आम लोगों की कैटेगरी से निकाल कर हैंडीकैप की श्रेणी में डाल देती है. इसके बावजूद कई ऐसे दिव्यांग पुरुष और महिलाएं हैं, जिन्होंने ना सिर्फ खुद के लिए एक मुकाम हासिल

एनीमिया से ग्रसित झारखंड का ग्रामीण क्षेत्र

एनीमिया रक्त से संबंधित एक ऐसी बीमारी है जो शरीर में आयरन की कमी से होता है. मानव शरीर में जब हीमोग्लोबिन का बनना कम हो जाता है तब शरीर की स्फूर्ति भी धीरे धीरे घटती चली जाती है, परिणामस्वरूप इंसान सुस्त व कमजोर होता चला जाता है. शरीर की क्रियाशीलता घटने से मनुष्य के जीवन की पूरी व्यवस्था ही कमोबेश प्रभावित हो जाती है और वह जीवन और मौत के बीच युद्धरत देखा जाता है.

मलिन बस्तियों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ता म्यूज़ियम स्कूल

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की रहने वाली शिबानी घोष एक ऐसी महिला है, जिन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद न सिर्फ अपने परिवार के लिए बल्कि वंचित समुदाय के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया. उनके इस संकल्प को पूरा करने में उनके पति प्रदीप घोष ने भी साथ दिया. शिबानी कहती हैं, कि उनके पति ने ही उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित किया.

झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का कमज़ोर ढांचा

झारखंड की स्थापना के 21 वर्ष बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की लचर स्थिति बनी हुई है. कई स्तर पर योजनाओं के संचालन के बाद भी स्थिति और आंकड़े निराशाजनक हैं. जनसंख्या के प्रतिफल में स्वास्थ्य और विकास के संकेतक अन्य राज्यों की तुलना में कमजोर हैं. स्वास्थ्य और विकास एक दूसरे के पूरक हैं. ऐसे में एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिये उसके नागरिकों को सेहतमंद होना जरूरी है.

मजदूर वर्ग को विशेष सहायता की ज़रूरत है

दो साल के तांडव के बाद फिलहाल देश में कोरोना की स्थिति पूरी तरह से कंट्रोल में है. जिसके बाद धीरे धीरे आम जनजीवन पटरी पर लौट रहा है. स्कूल से लेकर कल कारखाने तक पहले की तरह सामान्य रूप से काम करने लगे हैं. हालांकि चीन और कुछ पश्चिमी देशों में इसका प्रकोप फिर से बढ़ने से देश में भी जून-जुलाई तक चौथी लहर आने की आशंका व्यक्त की जा रही है. 

क्या रेगिस्तान को विकास की बलि देनी होगी?

जैसलमेर जिले के गांव कुछड़ी में आलाजी लोक देवता के नाम से छोड़ी गई 10 हजार बीघा ओरण भूमि भू-सैटलमेंट के दौरान राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई. एक दर्जन गांवों के मवेशी तथा जीव-जंतुओं की प्रजातियां इसी ओरण की शरण में जीवन-यापन करती हैं तथा थार की जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में योगदान देती है.

मिथक तोड़कर क्रिकेट में जौहर दिखाती आदिवासी लड़कियां

मध्य प्रदेश का हरदा जिला जो नर्मदापुरम का हिस्सा है और शांति और खुशहाली के लिए जाना जाता है. यहां का मुख्य व्यवसाय खेती-किसानी है. यहां की जमीन बहुत ही उपजाऊ मानी जाती है. इसके बावजूद आर्थिक और सामाजिक रूप से यह इलाका अभी भी बहुत पिछड़ा हुआ है. यहां की 70 फीसदी आबादी आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती है.

पुल को तरसता सरहदी गांव अराई मलका

शब्बीर अहमद की बेटी के पैर में चोट लगी है, उन्होंने उसका शहर जाकर इलाज करवाया। पुंछ से 20 किलोमीटर की यात्रा कर वो जब अपने गांव अराई मलका (Arai Village) पहुंचे तो उन्हें अपनी बेटी को चारपाई पर लेटाकर घर तक ले जाना पड़ा, क्योंकि उनके गांव में सड़क तो है लेकिन पुल नहीं है, जिसकी वजह से कोई गाड़ी घर तक नहीं जाती। वो कहते हैं कि अगर पुल होता तो शायद उन्हें आज इस मुसीबत का सामना नहीं करना पड़ता। चारों तरफ से पहाड़ों से घिरे जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) के अराई गांव में ज्यादातर जनजातीय लोग बसते हैं।

पुरुष प्रधान क्षेत्र में सीमा ने बनाया अपना मुक़ाम

इंद्रा नूई, नीता अंबानी, राधिका अग्रवाल, वाणी कोला ये ऐसी शख्सियत हैं, जो किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. हाल के दशकों में भारत में महिला उद्यमियों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. देश में लगभग 13.76 प्रतिशत उद्यमी महिलाएं हैं और 6 प्रतिशत महिलाएं भारतीय स्टार्टअप की संस्थापिका भी हैं. लेकिन बढ़ोत्तरी के बाद भी यह आंकड़े बहुत कम हैं. अमेरिकन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार यूएस में लगभग 13 मिलियन महिला अपना स्वयं का व्यवसाय चलाती हैं अथवा संभालती हैं. यह आंकड़ा यूएस में सभी कंपनियों के 42 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है.

युवा किसान सीख रहे हैं रसायन मुक्त खेती

भोपाल से 40 और सीहोर मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर अबीदाबाद पंचायत के रहने वाले धन सिंह वर्मा कुछ माह पहले तक अपने खेत से सिर्फ एक फसल ले पाते थे, क्योंकि उन्हें खेती की सही तकनीक नहीं मालूम थी. कभी-कभी तो वह डीएपी खाद नहीं मिल पाने के कारण यहां-वहां भटकते रहते थे और दुकानदार को मुंह मांगा दाम देकर खाद खरीद लाते थे. इससे उनकी खेती की लागत बढ़ जाती थी, लेकिन अब वह खुश हैं. उनके खेत के पास ही 25 एकड़ की वह जमीन जहां कम लागत से दो जैविक

भूखों को खाना उपलब्ध कराता छपरा का रोटी बैंक

साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भुखमरी और कुपोषण के मामले में 117 मुल्कों की सूची में हमारा देश 102वें स्थान पर है. वैश्विक भूख सूचकांक साल 2021 की रिपोर्ट के अनुसार भारत को कुल 116 देशों की सूची में 101वें स्थान पर रखा गया है. साल 2017 में नेशनल हेल्थ सर्वे (एनएचएस) की रिपोर्ट बताती है कि देश में 19 करोड़ लोग हर रात खाली पेट सोते हैं. भारत के लगभग सभी शहरों में सड़क किनारे आज भी कुछ लोग खाली पेट सोने को मजबूर हैं.

किसानों के लिए मुनाफा साबित हो रही है लेमन ग्रास की खेती

गेहूं, धान, दलहन, तिलहन जैसे पारंपरिक फसलों से इतर आमदनी बढ़ाने के लिए झारखंड के किसानों ने अब लेमन ग्रास जैसे नये उत्पादों से मुनाफा कमाने का एक नायाब तरीका ढूंढ निकाला है. बिना अधिक परिश्रम के ही न्यूनतम पूंजी पर अधिकतम लाभ का यह तरीका धीरे धीरे ही सही, किन्तु लगातार फैलता ही जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि सूखा प्रभावित इलाकों में भी आसानी से यह लगाया जा सकता है.

झारखंड के हस्तशिल्प कला में रोज़गार की संभावनाएं

झारखंड में हस्तशिल्प के कई शिल्पकार अब हुनरमंद बन रहे हैं. इन्हें वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार और झारखंड सरकार के हस्तशिल्प, रेशम एवं हस्तकरघा विभाग प्रशिक्षण दे रहा है. इसके माध्यम से शिल्पकारों और उनके परिवारों को आर्थिक संबल प्रदान किया जा रहा है. झारखंड में बंबू क्राफ्ट, डोकरा शिल्प, एप्लिक, हैंडलूम, रेशम, काथा स्टिच, टेराकोटा और जूट सहित कई हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जा रहा है. डोकरा शिल्प के डिजाइनर सुमंत बक्शी बताते हैं कि यह प्राचीन कला है

समस्या जल नहीं, जल विभाग है

कहा जाता है कि जल ही जीवन है. आखिर जल जीवन हो भी क्यों न. कपड़े धोने से लेकर खाना बनाने तक और नहाने से लेकर अपनी प्यास बुझाने तक हमें पानी की आवश्यकता पड़ती है, यानि पानी के बिना ज़िन्दगी जीना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. इंसान से लेकर सभी जीव जंतु और पेड़ पौधे तक पानी बिना अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह हैं. इसीलिए प्रकृति ने भी इसकी महत्ता को समझते हुए धरती पर भूमि से अधिक जल का भंडार दिया है. धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू कश्मीर में भी प्राकृतिक जल स्रोत के माध्यम

बिहार के बुनकरों को बाजार की ज़रूरत

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से हैंडलूम (हस्तकरघा) की अपनी समृद्ध परंपरा और हुनरमंद बुनकरों के हुनर को दुनिया के सामने लाने की अपील की थी. बावजूद इसके आज बिहार के विभिन्न जिलों के बुनकरों की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है. पहले से उनके पास काम की कमी तो थी ही, पिछले दो सालों में कोरोना के कारण उनके उत्पाद से जुड़े बाजार पर भी गहरा असर पड़ा है.

जन शक्ति से जल शक्ति की मिसाल है मूंडवा गांव

नागौर से 22 किलोमीटर दूर मूंडवा कस्बा आधुनिक विकास और पारंपरिक व्यवस्थाओं के बीच सामंजस्य के साथ विकसित हो रहा है. कस्बे के पास एक सीमेंट का प्लांट निर्माणाधीन है, जिससे मूंडवा ही नहीं, आस-पास के कई गांवों की आबोहवा बदलने वाली है. लेकिन वर्तमान में मूंडवा तथा आस-पास के गांवों के लोग न केवल पारंपरिक जल संसाधनों के रख-रखाव से प्रकृति का पोषण करने के अपने मानवीय कर्तव्य को जीवन में समाहित किए हुए हैं बल्कि पुरातन काल से आज तक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक

आदिवासी चित्रकारी में बसा है भूरी बाई का रचना संसार

भारतीय भील कलाकार भूरी बाई को वर्ष 2021 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया. भील जनजाति की संस्कृति को दीवारों और कैनवास पर उकेरने वाली मध्यप्रदेश की भूरी बाई को जब महामहिम राष्ट्रपति ने नई दिल्ली में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया, तो उनके चेहरे की चमक देखते ही बनती थी. दरअसल आदिवासी कलाकारों ने दुनिया के जितने भी चित्र खींचे, वे उनके अनुभव, उनकी स्मृति, और कल्पना में उपजे थे और उन्हें देखने वाली आंखों से भी