Charkha Feature Hindi

शर्म नहीं, शक्ति का प्रतीक है माहवारी

देश में किशोरी एवं महिला स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में काफी सुधार आया है। केंद्र से लेकर राज्य की सरकारों द्वारा इस क्षेत्र में लगातार सकारात्मक कदम उठाने का परिणाम है कि एक तरफ जहां उनके स्वास्थ्य के स्तर में सुधार आया है, वहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी प्रगति हुई है। कई राज्यों में महिला एवं किशोरियों के कुपोषण के दर में कमी आई है दूसरी ओर साक्षरता के दर में काफी प्रगति हुई है। लेकिन अब भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां सुधार की अत्यधिक आवश्यकता है। विशेषकर माहवारी के मुद्दे पर सबसे अधिक काम करने की ज़रूरत है। हालांकि सरकार की तरफ से न केवल इस विषय पर लगातार जागरूकता चलाई जा रही है बल्कि अधिक से अधिक सेनेट्री नैपकिन के उपयोग को बढ़ाने के उद्देश्य से इसे 2018 में इसे जीएसटी मुक्त भी कर दिया गया है।

लेकिन इसके बावजूद सामाजिक रूप से अभी भी माहवारी को शर्म और संकुचित विषय के रूप में देखा जाता है। माहवारी और सेनेट्री नैपकिन जैसे शब्दों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा करना आज भी गलत माना जाता है। यहां तक कि घर की चारदीवारियों के बीच भी बुज़ुर्ग महिलाएं इस पर बात करना पाप समझती हैं। यह परिस्थिती केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश के कई छोटे शहरों में भी बहुत हद तक यही देखने और सुनने को मिलता है। इसका सबसे अधिक नुकसान शिक्षा प्राप्त कर रही लड़कियों को उठाना पड़ता है। पीरियड्स के दिनों में उनकी शिक्षा बाधित हो जाती है, क्योंकि इस दौरान उन्हें स्कूल या कॉलेज में सैनेट्री पैड उपलब्ध नहीं हो पाता है। कई बार कक्षा के बीच में ही उन्हें माहवारी आने पर शर्मिंदगी का सामना भी करना पड़ता है। ऐसी परिस्थिती में लड़कियों के लिए शिक्षा पाना और क्लास करना बहुत मुश्किल होता है।

यह सर्वविदित है कि देश के छोटे शहरों में लड़कियां अनेक चुनौतियों को पार करके पढ़ाई करने जाती हैं। घर की दहलीज लांघकर अपने हौसले की उड़ान भरना शुरु करती हैं, मगर पीरियड्स उनके राह का रोड़ा बन जाता है। हालांकि यह एक ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें लड़कियां किशोरी बनने की दहलीज पर कदम रखती हैं। हालांकि पीरियड्स को एक वरदान समझना चाहिए मगर लोगों की नज़रों में यह एक अभिशाप होता है। लोगों को लाल दाग से नफरत होती है, मगर लोग यह भूल जाते हैं कि जन्म के समय हर एक मनुष्य इसी लाल खून में रंगा होता है, जो महिला के जननांगों से रिसता है। लेकिन इसके बावजूद देश के छोटे शहरों में माहवारी और सैनेट्री नैपकिन पर बात करने की जगह

किशोरी बालिकाओं की प्रेरणा बनी राधा

जब खुद में हिम्मत, विश्वास और हौसला हो तो रास्ते भी खुद-ब-खुद बन जाते हैं। वास्तव में कोई भी रास्ता छोटा या बड़ा नहीं होता बल्कि हर रास्ता मंज़िल तक पंहुचाने वाला होता है। यह केवल इस बात पर निर्भर करता है कि आप में उस पर चलने का हौसला कितना है। यह कहना है जयपुर से 60 किमी दूर टोंक ज़िला के मालपुरा ब्लॉक स्थित सोड़ा पंचायत की सरंपच छवि राजावत का, जो देश की पहली एम.बी.ए शिक्षा प्राप्त सरपंच है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक और पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ माडर्न मैनेजमेंट से एम.बी.ए करने के पश्चात कॉर्पोरेट क्षेत्र के कार्य को छोड़कर सामाजिक सेवा को अपना उद्देश्य बनाने वाली छवि आज की युवा पीढ़ी की रोल मॉडल है और उन्हें एक नई दिशा में बढ़ने का संदेश भी देती है।

ग्रामीण स्तर पर दिख रहा आत्मनिर्भरता का असर

आत्मनिर्भरता के परिणाम अब ग्रामीण स्तर पर दिखाई देने लगा है। ग्रामीण अपनी जमीन पर खेती के साथ-साथ आय बढ़ाने के अन्य साधन भी ढूंढ़ने लगे हैं। विशेषकर ग्रामीण महिलाएं अब मजदूरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू कर रही हैं। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के दौरे के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में इसके कई उदाहरण देखने को मिले। जब सड़क पर सरपट भागती गाड़ी एकाएक पानी के लिए मायाबाई कुमरे की दुकान पर रूकी। गांव लावापानी की 38 वर्षीय महिला माया एक स्वयंसेवी संस्था स्वस्ति द्वारा गठित आस्था स्वयं सहायता समूह की सदस्या है। उसके सामने उस समय मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था, जब अक्टूबर 2020 में उसके पति का एक्सीडेंट में पैर टूट गया। घर के एकमात्र कमाने वाले सदस्य का अचानक बिस्तर पकड़ लेने से आर्थिक तंगी हो गई। उसने सोचा, मात्र दो एकड़ जमीन के भरोसे कैसे परिवार का गुजारा होगा?

झारखंड में थम नहीं रहा कालाजार का प्रकोप

इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस समय देश और दुनिया में कोरोना एक महामारी का रूप लिया हुआ है। जिसके उन्मूलन के लिए अलग अलग स्तर पर टीका तैयार किया जा रहा है। लेकिन इसके साथ साथ कुछ ऐसी बीमारियां भी हैं, जो चुपके से अपना पैर पसार रही हैं और लोग असमय काल के गाल में समा रहे हैं। लेकिन कोरोना के आगे यह मीडिया में हेडलाइन नहीं बन पा रहा है। इनमें सबसे अधिक कालाज़ार की बीमारी है, जो झारखंड में तेज़ी से फ़ैल रहा है। राज्य के संताल परगना प्रमंडल में आदिवासी गांव में कालाजार के रोगी अधिक पाए जा रहे हैं। वर्ष 2013 से कालाजार के रोगी के मिलने का सिलसिला शुरू हुआ और अब तक यह सिलसिला जारी है। अब तक संताल परगना में लगभग 500 से अधिक कालाज़ार के रोगी चिन्हित किए जा चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकार ने वर्ष 2021 तक कालाजार उन्मूलन के लिए अभियान चलाया है।

घूंघट में रह कर स्वावलंबी बनती ग्रामीण महिलाएं

इंसान और पशु में बस इतना ही फ़र्क है कि पशु अपना सारा जीवन खाने और सोने में गुज़ार देता है, लेकिन इंसान की शिक्षा उसे इतना सक्षम बनाती है कि वह खुद के साथ साथ अपना और अपने समाज को बढ़ाने में मदद करता है। बाबा साहब अम्बेडर हमेशा कहा करते थे कि “यदि किसी समाज की तरक्की का अंदाज़ा लगाना है तो पहले देखो कि उस समाज में महिलाओ की स्थिति क्या है?” हमारी व्यवस्था और सरकारी तंत्र आज़ादी के बाद से ही हाशिए पर खड़ी महिलाओं को आगे लाने की कोशिशों में लगा हुआ है। इसके लिए गांव से लेकर महानगर स्तर तक महिला सशक्तिकरण से जुड़ी अनेकों योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनमें जहां उनकी शिक्षा पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है, वहीं उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के भी प्रयास किये जा रहे हैं। महिला आरक्षण ने इस बात को और बल दिया। इसी का सकारात्मक परिणाम है कि आज के समय में महिलाएं हर छोटे बड़े स्तर पर काम करती दिखाई दे रही हैं।

बीहड़ में स्त्री स्वाभिमान की जागरूकता

भारतीय समाज में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं पीरियड्स को लेकर कई मिथकों और संकोचों में अपना जीवन गुजार रही हैं। ’पीरियड्स’ महिलाओं की जिंदगी से जुड़ा एक अहम विषय है, जिस पर खुलकर बात नहीं होती है। देश के बड़े शहरों में हालात जरूर थोड़े बदले हैं, लेकिन गांव और कस्बों में अभी भी ये चुप्पी का मुद्दा है, जिसे शर्म और संकोच की नजर से देखा जाता है। गांव की महिलाएं इस पर चर्चा न घर में कर पाती हैं और न ही अपनी किशोर बेटियों को इस बारे विस्तार से बता पाती हैं, जिस कारण साफ-सफाई के अभाव में गंभीर बीमारियों से संक्रमित होने का खतरा उनमें लगातार बना रहता है। स्वास्थ्य विभाग के तमाम जागरूकता अभियानों के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति जस की तस है। टीवी-अखबारों में सैनिटरी पैड्स के विज्ञापनों की गूंज गांवों तक तो है, परंतु उपयोग नही के बराबर है।

मजबूत हौसले ने दी उड़ान

पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए कहा था कि पिछले कुछ वर्षों में देश में मुस्लिम बालिका शिक्षा की दर में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। पहले की अपेक्षा स्कूल जाने वाली मुस्लिम बालिकाओं की संख्या बढ़ी है। स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय का निर्माण और अन्य योजनाओं के कारण यह परिवर्तन संभव हुआ है। एक तरफ जहां सरकार इस दिशा में गंभीर है, वहीं मुस्लिम समाज में भी बालिका शिक्षा के प्रति जागरूकता इस दिशा में अहम कड़ी साबित हुआ है। पहले की तुलना में इस समाज में लड़कियों को केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं रखा जाता है बल्कि लड़कों के समान उन्हें भी बराबरी का मौका दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त देश के कई राज्यों में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विशेष छात्रवृति और स्कूल आने जाने के लिए साइकिल जैसी सुविधा भी प्रदान की जा रही है।

संकट को संभावनाओं में बदलती महिलाएं

कोरोना संक्रमण के संकट को पीछे छोड़ते हुए भारत ने एक साथ दो वैक्सीन बना कर जो इतिहास रचा है, उसे मानव सभ्यता कभी नहीं भूलेगी। लेकिन संक्रमण काल में जिस तरह से इंसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, उस काले अध्याय को भी भूला पाना नामुमकिन है। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता गया था, वैसे-वैसे लोगों के मन में इसकी दहशत भी बढ़ती गई थी। भारत में इस वौश्विक महामारी का सबसे बुरा प्रभाव महाराष्ट्र में हुआ। यहां इसकी चपेट में सबसे ज्यादा मुंबई, ठाणे और पुणे सहित पश्चिम महाराष्ट्र के सतारा, सांगली तथा कोल्हापुर जैसे शहर रहे। यही वजह रही कि इन क्षेत्रों में राज्य सरकार द्वारा सख्त लॉकडाउन लगाया गया और जिसका असर आम जनजीवन पर देखने को मिला। 

थार के पारिस्थितिक तंत्र में अक्षय ऊर्जा की संभावनाएं

रेगिस्तान में अक्षय ऊर्जा अर्थात सौर और विंड एनर्जी निर्माण की अपार संभावनाएं हैं। यहां साल के अधिकांश दिनों में सूर्य दर्शन होता है तथा तेज हवाएं भी चलती रहती हैं। अक्षय ऊर्जा की संभावनाओं को देखते हुए सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर ऊर्जा उत्पादन और वितरण पर कार्य चल रहा है। जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर के कुछ क्षेत्रों में सोलर प्लांट और पवन चक्कियां दिख जाती हैं जो इन संभावनाओं के विस्तार की पुष्टि करती है। इस संबंध में राज्य के ऊर्जा मंत्री डाॅ. बी.डी. कल्ला भी तीसरे वैश्विक रैन्यूएबल एनर्जी इन्वेस्ट के स्टेट सेशन में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय निजी निवेशकों को अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में राजस्थान में निवेश करने का आह्वान कर चुके हैं। उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि राज्य में 10 हजार मेगावाट से अधिक क्षमता के अक्षय ऊर्जा के सयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं।

20 साल बाद भी सुविधाओं से वंचित हैं पहाड़ी गाँव

बेहतर सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार एवं आजीविका की अपेक्षाओं के साथ उत्तरप्रदेश से पृथक हुए राज्य उत्तराखंड आज भी इन मूलभूत आवश्यकताओं के लिए तरस रहा है। राज्य स्थापना के 20 वर्ष बाद भी इस पर्वतीय प्रदेश का रहवासी जीवन के लिए जरूरी मूलभूत ज़रूरतों के लिए संघर्षरत है। कोरोना महामारी के समय पहाड़ के गाँवों से रोज़गार के लिए शहरों में विस्तापित हजारों युवा वापस अपने गाँवों की ओर आये थे। जिसके बाद उनके रोज़गार के लिए सरकार की ओर से की गई घोषणाओं से एक आस जगी थी, कि स्थानीय स्तर पर ही अपना कुछ स्वरोजगार प्रारंभ कर अपने लिए आजीविका का बंदोबस्त कर लेंगे।

नही हो रहा किशोरी बालिकाओं की समस्या का समाधान

संपूर्ण राजस्थान विविधताओं से भरा है। यह विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं, प्रचलनों, प्रथाओं और सामाजिक, भौगोलिक परिवेश को अपने अन्दर समाहित किये हुये है। यहां महिलाओं की आन, बान और शान का एक लंबा इतिहास रहा है। उनके जीवन चक्र को समाज अपनी इज़्ज़त और सम्मान से जोड़ता रहा है। यही कारण है कि इस क्षेत्र की महिलाओं और बालिकाओं को कई समस्याओं का सामना भी करना पड़ता रहा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उनपर अनेकों बंदिशें लगाई जाती रही हैं। इज़्ज़त और मान सम्मान के नाम पर इस क्षेत्र में महिलाओं और किशोरियों की समस्याएं घर के अंदर ही घुट कर रह जाती हैं। आज भी पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं और किशोरी बालिकाओं को बहुत सी समस्याओं, चुनौतियों, परेशानियों से लड़ते हुए अपना जीवन यापन करते देखा जाता है।

खुद बीमार है उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं पटरी से उतर चुकी हैं। खास तौर से भौगोलिक विषमताओं वाले यहां के पर्वतीय क्षेत्रों में मातृ एवं शिशुओं की देखभाल के सरकारी इंतजाम अति दयनीय दशा में हैं। पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों के हालात और भी ज़्यादा खराब हैं। यहां के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र स्वयं गंभीर रूप से बीमार हैं। इन केंद्रों मे पानी व बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं होने से ही अंदाजा लगाया जा सकता है यह केन्द्र किस तरह संचालित हो रहे होंगे। इन बीमार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व अस्पतालों पर आश्रित रोगी सिर्फ भगवान भरोसे ही आते हैं।

स्तन कैंसर के खतरे से अनजान हैं ग्रामीण महिलाएं

बिहार के एक ग्रामीण इलाके की रहने वाली कुसुमलता (बदला हुआ नाम) को स्तन कैंसर के कारण अपने स्तन हटवाने पड़े थे, क्योंकि उसकी जान पर बन आई थी। इस प्रक्रिया से उसकी ज़िंदगी तो बच गई लेकिन उसका जीवन और भी नरकीय हो गया। स्तनों के हटने के बाद उसके पति ने उसकी परवाह करना छोड़ दिया क्योंकि अब उसे अपनी पत्नी में प्यार नज़र नहीं आता था। इतना ही नहीं मुसीबत की इस घड़ी में उसका साथ देने की बजाए ससुराल वालों ने भी जहां उसका साथ छोड़ दिया वहीं महिलाएं ही उसे ताना देने लगीं क्योंकि अब वह उनकी नज़र में एक महिला नहीं रह गई थी।

रोज़गार का सशक्त माध्यम बन सकता है पशुधन

ऐसे वक़्त में जबकि देश में रोज़गार के अवसर कम होते जा रहे हैं, बड़ी बड़ी कंपनियां कर्मचारियों की छटनी कर रही हैं, रोज़गार के अवसर लगातार सीमित होते जा रहे हैं, ऐसे वक़्त में भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में रोज़गार के अवसर उपलब्ध हैं। वास्तव में देश की एक बड़ी आबादी कृषि तथा कृषि आधारित रोज़गार पर निर्भर है। जिसमें पशुपालन और उससे जुड़े अन्य रोज़गार भी शामिल है। इन्हीं में डेयरी उद्योग भी जुड़ा है। जिससे युवा किसानों को नए रोज़गार भी मिल रहे हैं। प्रत्येक गांव और कस्बों में डेयरी सेंटरों की संख्या बढ़ रही है। यह संभव हुआ है दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने से। एक समय था जब श्वेत क्रांति के लिए पूरी दुनिया में भारत को जाना जाता था। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों द्वारा ज़्यादा से ज़्यादा गाय, भैंस और बकरी पालने की वजह से दूध का कारोबार।

विलुप्त होती कला को बचाने की चुनौती

बड़े पैमाने पर आर्टिफिशियल (प्लास्टिक, फाइबर व अन्य मिश्रित धातुओं से निर्मित) वस्तुओं का उत्पादन और घर घर तक इनकी पहुँच से जहाँ एक ओर कुम्हार (प्रजापति) समुदाय के पुश्तैनी कारोबार को पिछले कुछ वर्षों से भारी क्षति का सामना करना पड़ा है, वहीं दूसरी ओर चीन निर्मित वस्तुओं का आयात और बड़े पैमाने पर भारत के बाजारों में उनका व्यवसाय भी उनके आर्थिक पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण रहा हैं। गरीबी, अशिक्षा, आर्थिक पिछड़ेपन, सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर पर उपेक्षित जीवन, रुग्न मानसिकता, माटी कला बोर्ड की स्थापना का न होना, काम के प्रति अनिच्छा, महंगाई, हाथ निर्मित वस्तुओं की मांग में भारी कमी, उन्नत शिल्प का अभाव और तकनीकी शिक्षा की कमी उन्हें उनके पुश्तैनी पेशे से दूर करता रहा है। 

थार के संसाधनों पर मंडराता अस्तित्व का खतरा

राजस्थान का थार क्षेत्र केवल बालू की भूमि ही नहीं है, बल्कि कुदरत ने इसे भरपूर प्राकृतिक संसाधनों से भी नवाज़ा है। लेकिन धीरे धीरे अब इसके अस्तित्व पर संकट के बादल गहराने लगे हैं। यह संकट मानव निर्मित हैं। जो अपने फायदे के लिए कुदरत के इस अनमोल ख़ज़ाने को छिन्न भिन्न करने पर आतुर है। यहां की शामलात भूमि (सामुदायिक भूमि) को अधिग्रहित कर उसे आर्थिक क्षेत्र में तब्दील किया जा रहा है।

आपदा को अवसर में बदलती ग्रामीण महिलाएं

कोरोना महामारी ने देश-दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम जनता की आर्थिक स्थिति को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। एक तरफ जहां लाॅक डाउन में लोगों का रोजगार छिन गया तो अनलाॅक होने के बाद भी लोगों को आसानी से काम नहीं मिल रहा है। शहरी क्षेत्रों में मजदूरों की आवश्यकता होने के कारण जैसे-तैसे उन्हें काम मिल भी जा रहा है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में रोज़गार की समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है। बड़ी संख्या में लोग अभी भी रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं।

गोबर के दीयों से मिला रोज़गार

छत्तीसगढ़ में गोधन न्याय योजना शुरू होने के बाद से यहां गोबर का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है, कल तक सिर्फ कंडे और खाद बनाने के काम आने वाला गोबर अब रंग बिरंगे दीयों का रूप लेकर दीपावली में जगमगाने को तैयार है। स्व-सहायता समूह की महिलाएं गोठानों में खाद बनाने के लिए खरीदे गए गोबर का अब दूसरा उपयोग दीया बनाने में भी कर रही हैं।

लघु उद्योग बदल सकते है पहाड़ी गांवों का स्वरूप

युक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रकाशित नवीनतम मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में बेरोज़गारी दर 2004-2005 में 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2017-2018 में 4.2 प्रतिशत थी जो राज्य सरकार के लिए चिन्ता का विषय है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि उच्च बेरोज़गारी दर के पीछे सरकारी व निजी क्षेत्रों में रोज़गार के पर्याप्त अवसर पैदा करने में राज्य की अक्षमता है।

मुख्यधारा से अभी भी दूर है पहाड़िया समाज

संथाल परगना प्रमण्डल के हरित पर्वत मालाओं, घने जंगलों, स्वच्छंद नदी-नालों तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए अंग्रेजों, जमींदार और महाजनों जैसे शोषक वर्गों से लोहा लेने वाली आदिम जाति पहाड़िया समुदाय का अपना एक विशिष्ट इतिहास रहा है। इसे भारत की दुर्लभ जनजातियों में से एक माना जाता है। उपलब्ध दस्तावेज़ों व प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पहाड़िया समुदाय संथाल परगना प्रमण्डल के आदि काल के बाशिंदे हैं।

फसल ख़राबी से किसान हैं परेशान

नए कृषि कानूनों के खिलाफ देशभर में किसानों के साथ सामाजिक संगठनों से लेकर बड़े बड़े राजनीतिक दल विरोध दर्ज करा रहे हैं। वहीं किसान सड़कों पर उतर कर इस बिल को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपनी खड़ी फसलों को कीट पतंगों की प्रकोप से बचाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।

भारत में महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार

भारत में अब महिलाओं पर अत्याचार, हिंसा और शोषण जैसी अमानवीय घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. पूरे देश में महिलाएं हर जगह, हर समय, हर क्षण, हर परिस्थिति में हिंसा के किसी भी रूप का शिकार हो रही हैं. जैसे-जैसे देश आधुनिकता की तरफ बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे महिलाओं पर हिंसा के तरीके और आंकड़ें भी बढ़ते जा रहें हैं. यदि हिंसा के नए रूपों की बात करें तो इनमें अश्लील कृत्य, फूहड़ गाने, किसी महिला की शालीनता को अपमानित करने के इरादे से प्रयोग किये जाने वाले शब्द, अश्लील इशारा, गलत नीयत से पीछा करना, अवैध व्यापार, बदला लेने की नीयत से तेज़ाब

पानी जब ज़हर बन गया

दो साल से खाट पर पड़ा हूँ। हाथ-पैर काम नहीं करता। दर्द ऐसा कि सहा तक नहीं जाता। क्या करूँ बाबू, परिवार के लिए बोझ ही तो बन गया हूँ? बस अब पड़े-पड़े मौत का इंतजार कर रहा हूं! बांस और टाट से निर्मित एक टूटी सी झोपड़ी के अंधेरे कोने में, खाट पर बैठा 58 वर्षीय सफल मुर्मू जिंदगी की अंतिम घड़ियाँ गिनते हुए अचानक फफक पड़ता है।

भारी शारीरिक पीड़ा के बावजूद अपनी जिंदगी से हार नहीं मानने वाला व्यक्ति हार रहा है तो सिर्फ अपनी शारीरिक अक्षमता की वजह से। यह कड़वी सच्चाई उस गाँव की है, जहां जीवन देने वाला जल ही वहां के लोगों के लिये जहर साबित हो रहा है। जल जनित बिमारी फ्लोरोसिस के कारण झारखंड के साहेबगंज जिलान्तर्गत बरहेट विधानसभा क्षेत्र

ज्यादा मुनाफ़ा दे रहा जैविक खेती का सामूहिक प्रयास

देश में कृषि सुधार विधेयक पर जमकर घमासान मचा हुआ है। सरकार जहां इस विधेयक को ऐतिहासिक और किसानों के हक़ में बता रही है, वहीं विपक्ष इसे किसान विरोधी विधेयक बता कर इसका पुरज़ोर विरोध कर रहा है। हालांकि संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद यह विधेयक अब राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जा चुका है, जिनकी सहमति के बाद विधेयक लागू हो जाएगा। लेकिन इसके बावजूद विपक्ष इसके खिलाफ सड़कों पर उतरा हुआ है। इस संवैधानिक लड़ाई से अलग देश का अन्नदाता अपनी फसल को बेहतर से बेहतर बनाने में लगा हुआ है, ताकि देश में अन्न की कमी न हो।

शिक्षा का अलख जगाए रखने की जद्दोजहद

लॉक डाउन की भयावह स्थिति से गुजरते हुए पिछले छह महीनें से विश्व के तकरीबन सभी छोटे-बड़े देश मैराथन बंदी का अभिशाप झेलने पर मजबूर हैं। इस दौरान पूरी दुनिया में जन जीवन पूरी तरह ठहर सा गया है। इस वैश्विक संकट में न तो स्कूल-काॅलेजों में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं को काॅपी-किताब के साथ सड़कों पर देखा जा रहा है, और न ही सरकारी-गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं, संगठनों सहित सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक व राजनीतिक संस्थाओं की गतिविधियां नज़र आ रही हैं। 

प्लास्टिक की गिरफ़्त में इंसानी ज़िंदगी

आज के वैज्ञानिक युग में न केवल मानव विकास की रफ्तार बढ़ी है बल्कि विज्ञान ने इंसान के जीवन को और भी अधिक सरल और सुविधाजनक बना दिया है। हालांकि नई तकनीक के प्रयोग ने कई बिमारियों, चुनौतियों और समस्याओं को भी जन्म दिया है। विज्ञान और आधुनिक तकनीकों के प्रयोग ने प्राकृतिक वातावरण को दूषित ही नहीं किया बल्कि मानवीकृत वैज्ञानिक वातावरण का जाल

सरकारी नीतियों से परेशान उत्तराखंड के किसान

कोरोना महामारी ने जिस तरह से पूरी दुनिया को प्रभावित किया है, उसकी गूंज सदियों तक इतिहास में सुनाई देती रहेगी। इस महामारी ने मानव जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। विशेषकर दुनिया भर की अर्थव्यवस्था इस महामारी की शिकार हुई है। दुनिया के सात सबसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था तक इस महामारी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी है। कोरोना की मार से भारत की अर्थव्यवस्था भी बहुत हद तक चरमराई है।

कौन सुनेगा शिक्षकों का दर्द?

विशेषकर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले हज़ारों टीचर्स की ज़िंदगी इस कोरोना काल में प्रभावित हुई लेकिन ना तो मीडिया और ना ही समाज को इसकी कोई फिक्र है। इन सबके बावजूद टीचर्स से पूर्व की अपेक्षा ज़्यादा काम लिया जा रहा है और वेतन के नाम पर कहीं खाली लिफाफा थमाया जा रहा है, तो कहीं वेतन में कटौती की जा रही है।

समुदाय की सहभागिता के बिना योजनाएं सफल नहीं

हमारे देश में बहुत सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। केंद्र से लेकर राज्य और ब्लॉक स्तर से लेकर पंचायत स्तर तक अनेकों योजनाएं हैं। इन सभी योजनाओं का अंतिम लक्ष्य समुदाय को लाभ पहुँचाना है। उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाना और क्षेत्र का विकास करना है।

नहीं रुक रहा महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध

कोरोना के आपदा काल में जब समूचा विश्व महामारी से बचाव के लिए जीवनोपयोगी वैक्सीन बनाने की कवायद में जुटा है, जब पूरी दुनिया इस आफत से मानव सभ्यता को बचाने में चिंतित है ऐसी मुश्किल घड़ी में भी महिलाओं की सुरक्षा एक अहम प्रश्न बनी हुई है, क्योंकि संकट की इस घड़ी में भी महिलाओं के खिलाफ अपराध में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। अनलॉक प्रक्रिया में जहां महिलाओं के खिलाफ हिंसा के सभी स्वरूपों में वृद्धि हुई है। वहीं लॉक डाउन के दौरान भी महिलाएं हर पल अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए समाज

महिलाओं के साथ भेदभाव करता है समाज

भारत में हिंसा के सबसे अधिक केस महिलाओं से ही जुड़े होते हैं। जिनका रूप कुछ भी हो सकता है। हालांकि पुरूष प्रधान इस देश में हमेशा महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता रहा है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कमतर आंका जाता है। उसे कमज़ोर, असहाय और अबला समझ कर उसके साथ कभी दोयम दर्जे का तो कभी जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है।

गोबर से बदलेगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सूरत

अब तक सड़क पर पडे़ जिस गोबर के पांव में लगने भर से हम आक्रोशित हो जाते हैं, वही गोबर अब छत्तीसगढ़ के लाखों किसानों और पशुपालकों के लिए आय का माध्यम बन रहा है। राज्य सरकार ने गोधन न्याय योजना के तहत प्रदेश भर में किसानों और पशुपालकों से गोबर खरीदने की नई योजना शुरू की है। इससे कम लागत पर वर्मी कंपोस्ट (जैविक खाद) बनाकर पुनः किसानों को जैविक खाद के रूप में सस्ते दामों पर बेची जाएगी।

कहानी उनकी, जिन्होंने शिक्षा की लौ थामे रखा

भारत समेत पूरी दुनिया इस समय जिस आपदा और संकट से गुज़र रहा है, उसे लंबे समय तक इतिहास में याद रखा जायेगा। मुश्किल की इस घड़ी में जब हर तरफ दुःख का ही सागर हो, ऐसे समय में कोई एक सकारात्मक पहल भी सुकून देने वाला होता है। विशेषकर जब यह पहल महिला शिक्षा से जुड़ी हो और ऐसे इलाकों से जहां साक्षरता की दर अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कम हो, तो यह सुकून और भी बढ़ जाता है।

सब पढे-सब बढे, लेकिन कैसे?

देश मे 3-4 साल बाद एक बार फिर से शिक्षा नीति में बदलाव होने जा रहा है। अच्छी बात यह है कि यह बदलाव होने जा रहा है। अच्छी बात यह है कि यह बदलाव प्राथमिक स्तर पर भी की गई है। यानि बच्चों के बुनियादी ढांचे को मजबुत करने पर भी जोर दिया गया है। नई नीति के तहत इस बात पर फोकस किया गया है कि प्राथमिक लेवल से ही बच्चे का रुझान सीखने की तरफ बना रहे। यह एक अच्छी सोच है। साइंस और कॉप्म्यूटर के इस दौर में पढने के साथ-साथ सीखने पर भी जोर दिया जाना जरुरी है।

अपनी जान पर जोखिम, ताकि बची रहे आपकी जान

इस वर्ष का स्वतंत्रता दिवस पिछले तमाम वर्षों से अलग तरह से मनाया जा रहा है। हालांकि कोरोना काल की काली छाया के बावजूद जश्ने आज़ादी की धूम फीकी नहीं पड़ रही है। आज़ादी के इस जश्न में एक तरफ जहां स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया जा रहा है वहीं कोरोना योद्धाओं का भी सम्मान किया जा रहा है। कोरोना को हराने और देश को सुरक्षित रखने में स्वास्थ्यकर्मी और पुलिस बलों ने जो योगदान दिया है, उसका पूरा भारतवर्ष ऋणी रहेगा।

वनवासी महिलाओं को मुख्यधारा से जोड़ने की ज़रूरत

महिलाओं के जीवन और उनके अधिकारों के संबंध में आज भी भारतीय समाज दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ जहां उसके बिना समाज का अस्तित्व मुमकिन नहीं माना जाता है वहीं दूसरी ओर उसे उसके सभी अधिकारों से भी वंचित रखने का प्रयास किया जाता है। हालांकि पितृसत्तात्मक समाज की बहुलता होने के बावजूद देश के ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां समाज के संचालन की ज़िम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर होती है।

ठहर गई है ख़ानाबदोशों की ज़िंदगी

कोरोना के खतरे के बीच भले ही धीरे धीरे व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो गईं हों, लेकिन इस महामारी ने अपने पीछे जो निशान छोड़ा है, उसे सदियों तक मानव जाति भुला नहीं पायेगी। इससे न केवल लाखों लोग असमय काल के गाल में समा गए बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ध्वस्त गई है। कोरोना के दुष्प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा। इसका सबसे ज़्यादा नकारात्मक प्रभाव देश के गरीब, पिछड़े और मुश्किल से दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करने वाले मज़दूरों की ज़िंदगी पर पड़ा है।

गरीब महिलाओं का जीवन कोरोना से अधिक डरावना है

किसी भी प्रकार की आपदा का सबसे अधिक प्रभाव सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों पर पड़ता है। आर्थिक नुकसान के रूप में भले ही मध्यम व उच्च आय वालों को अधिक नुकसान होता है, लेकिन जो वर्ग सामान्य समय में निम्न आय से अपनी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते, किसी भी प्रकार की आपदा में बूरी तरह से टूट जाते हैं। महिलाएं सभी वर्गों में किसी न किसी प्रकार की निःसहायता में जकड़ी हुई हैं।

माहवारी पर चुप्पी तोड रही बरड की बालिकाएं

राजस्थान के बूंदी जिले के तालेडा ब्लॉक की १२ ग्राम पंचायतो के क्षेत्र को बरड क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र बूंदी जिला मुख्यालय से ५० कि.मी. दूर दक्षिण पश्चिम दिशा में चित्तौडगढ और भीलवाडा जिले की सीमा से लगा हुआ है। यह इलाका बंजर, पथरीला एवं खनन क्षेत्र है। यहा खदानों में काम करने भारत के अलग अलग राज्यों से लोग आते है। इस कारण बरड क्षेत्र को मिनी भारत भी कहा जाता है। डाबी कस्बे को बरड की ह्दय स्थली कहा जाता है।

मालिकाना हक से वंचित महिला किसान

राजस्थान मे बाडमेर जिले की पचपदरा तहसील के कबीरनगर की महिला किसान उमा देवी (बदला हुआ नाम) के पति का देहांत १९८७ में हो गया था। आजीविका का मुख्य साधन खेती, पशुपालन और मजदूरी है। एक बेटी है जिसका पालन पोषण किया, पढाया-लिखाया और शादी की। पति के देहांत के बाद उनके हिस्से की खातेदारी कृषि भूमि उमा देवी के नाम होनी थी। परिवार के भाई-बंधुओं ने चुपके-चुपके अपने नाम करवा ली।

बालिका शिक्षा के प्रति सोच बदलने की जरूरत

कोरोना महामारी से लडने में डॉक्टर और नर्स से लेकर सभी स्तर के स्वास्थ्यकर्मी जिस प्रकार से अपना योगदान दे रहे है, उसे इतिहास में सुनहरे अक्षरों मे लिखा जायेगा। विशेषकर भारत में आवश्यक सुरक्षा उपकरणों की कमी के बावजूद अपनी जान जोखिम डालकर नर्स करोना पीडितों की जिसप्रकार से सेवा कर रही है, वह प्रशंसनीय है। आपात स्थिती की इस घडी में सेवा भाव से उन्होनें यह साबित कर दिया है।