बेजुबान पक्षियों को बचाने की मुहिम

वन्य प्राणी, पशु-पक्षी, जीव-जंतु आदि हमारे सहचर हैं. पर्यावरण संतुलन एवं भोजन चक्र को बनाए रखने के लिए भी ये बेजुबान प्राणी हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं. इस लिहाज से इनका संरक्षण करना बेहद जरूरी है. लेकिन चिंता की बात है कि मनुष्य की सुविधाभोगी जीवन शैली, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन एवं वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण हमारा पर्यावरण बीमार होता चला जा रहा है. पारिस्थितिकी-तंत्र में बेहिसाब बदलाव हुए हैं जिससे हमारी धरती गर्म हो रही है. इसका नतीजा यह हुआ कि बेजुबान प्राणियों की जिंदगी खतरे में आ गयी है. दुनिया के नक्शे पर जलवायु परिवर्तन का असर साफ़ तौर पर देखा जा रहा है. भारत भी इस वैश्विक समस्या से अछूता नहीं है. देश के लगभग सभी राज्यों में पक्षियों के लिए संरक्षित विहारों में इसका प्रभाव साफ़ तौर पर देखने को मिल रहा है.

कानून बनाने से नहीं, सोच बदलने से ख़त्म होगी लैंगिक असमानता

कहते हैं कि जिस घर में होता है बेटियों का सम्मान, वह घर होता है स्वर्ग के समान. हमारा संविधान किसी प्रकार से लड़का और लड़की में फर्क की इजाज़त नहीं देता है. लेकिन आज़ादी के 75 साल में भी देश के दूरदराज इलाकों में लैंगिक असमानता बनी हुई है. हालांकि इन्ही असमानताओं को ख़त्म करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 24 जनवरी 2008 में राष्ट्रीय बालिका दिवस की शुरुआत की थी. इस अभियान का उद्देश्य जहां लड़कियों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करना है वहीं उन्हें सशक्त बनाना भी है. इसके साथ ही समाज में लोगों को बेटियों के प्रति जागरूक करना और यह भी सुनिश्चित करना है कि हर बालिका को उसका मानवीय अधिकार मिले. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने बालिका दिवस को मनाने के लिए 24 जनवरी का दिन इसलिए भी सुनिश्चित किया, क्योंकि इसी दिन 1966 में इंदिरा गांधी ने भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी.

गांव में देसी शराब से बर्बाद हो रहे गरीब-मजदूर

बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में देसी शराब से होने वाली मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. अभी एक महीना पहले ही इसके सेवन से दो दर्जन से अधिक लोगों ने अपनी जान गवाई थी. आश्चर्य की बात यह है कि पिछले महीने जिस छपरा जिला में यह घटना हुई थी, एक माह के अंदर ही उसकी सीमा से सटे सिवान और गोपालगंज के इलाके में देसी शराब के सेवन से मौतें हुई हैं. हालांकि प्रशासन इस मुद्दे पर काफी गंभीरता का परिचय देते हुए लगातार छापेमारी कर देसी शराब की भट्टियों को नष्ट कर इसमें लिप्त लोगों को गिरफ्तार कर रहा है. लेकिन ऐसा लगता है कि अपराधी प्रशासन से दो कदम आगे चल रहा है. दरअसल अपराधी समाज की जड़ में फ़ैल चुकी इस बुराई का लाभ उठा रहे हैं. नशे के आदि लोगों की कमज़ोरियों का फायदा उठाते हुए गांवों में छुपकर देसी तरीके से शराब बनाई जाती है, जो अंततः मौत का कारण बनती है.

छात्रवृत्ति योजना से क्यों वंचित हैं बिहार की छात्राएं?

किसी भी प्रकार की छात्रवृत्ति आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को उच्च शिक्षा प्राप्त कर जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती है. इसे उनके उज्ज्वल भविष्य की कुंजी मानी जाती है. यही कारण है कि केंद्र से लेकर तमाम राज्य सरकारें और केंद्रशासित प्रदेश कई अलग अलग नामों से छात्रवृत्ति योजनाएं चला रही है ताकि आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े छात्रों को आगे बढ़ने का अवसर मिल सके. बिहार में भी कई प्रकार की छात्रवृत्ति योजनाएं संचालित की जा रही हैं. कुछ छात्रवृति योजना विशेष रूप से किशोरियों के लिए शुरू की गई हैं. इसमें “मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना” प्रमुख है. कहा जाता है कि यह योजना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर शुरू की गई थी और वह स्वयं इस योजना में खासी दिलचस्पी लेते हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि यह योजना अनियमितता और विभिन्न बाधाओं के कारण अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ हो रही है.

राजस्थान की कलात्मक विरासत को सहेजती महिलाएं

राजस्थान के विभिन्न हस्तशिल्प कलाओं में लाख की चूड़ियां अन्य आभूषणों से बहुत पहले से मौजूद थी. वैदिक युग की यह ऐतिहासिक विरासत कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन व्यापारियों और कारीगरों के हाथों से चली आ रही है जो निर्माण से लेकर बिक्री तक की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग हैं. इसके विभिन्न रंगों और श्रमसाध्य प्रक्रिया के पीछे एक समृद्ध सांस्कृतिक संदर्भ जुड़ा है. बड़ी बात यह है कि इस विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने में महिलाओं का विशेष योगदान है. लाख की चूड़ियां बनाने वाली इन्हीं महिलाओं में सलमा शेख और उनकी बहू आफरीन शेख भी एक हैं. 

फर्जी डॉक्टरों के चक्कर में जान गंवा रहे बिहार के गरीब

बिहार सरकार जिन क्षेत्रों में सबसे अधिक सुधार की ज़रूरत पर बल दे रही है, उनमें शिक्षा और स्वास्थ्य प्रमुख है ताकि पढ़ाई और इलाज के लिए बच्चों और मरीज़ों को दूसरे राज्यों में भटकना न पड़े. लेकिन हैरत की बात यह है कि इतने प्रयासों के बाद भी इन्हीं दोनों सेक्टर में सबसे अधिक कमियां और पलायन देखने को मिलते हैं. बेहतर इलाज के लिए लोग दिल्ली और चंडीगढ़ जाने को मजबूर हैं. जो गरीब और बेबस रह गए हैं वह सरकारी अस्पताल की बदइंतजामी और भ्रष्टाचार की वजह से सस्ता और सुविधाजनक इलाज के नाम पर अपनी जान गंवा रहे हैं. आए दिन अखबार के पन्ने ऐसी खबरों से भरे रहते हैं. 

मौसम के बदलते मिजाज़ को समझना ज़रूरी है

जोशीमठ में जो कुछ भी हो रहा है, वह प्राकृतिक आपदा तो बिल्कुल भी नहीं है. विकास के नाम पर विनाश की यह नींव हम इंसानों ने ही रखी है. इसकी शुरुआत कोई एक दो साल पहले नहीं हुई है बल्कि दशकों से यही सब होता आ रहा है. ऐसा नहीं है कि किसी ने हमें इसके दुष्परिणाम के बारे में नहीं बताया था. पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई समितियों की हज़ारों रिपोर्टें कहीं धूल खा रही हैं जिसमें उन्होंने विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ के प्रति चेताया था. लेकिन उन्हें विकास विरोधी कह कर उनकी चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. परिणाम धीरे धीरे सबके सामने आ रहा है.

खाना बनाने के शौक ने क्लाउड किचन की शुरुआत की

वैश्विक स्तर पर साल 2020, दुनिया के लोगों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा, पूरी दुनिया में बीमारी रूपी अज्ञात शत्रु कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सख्त लॉकडाउन कानून लागू किया गया. इसके खौफ के चलते स्कूलों, स्कूलों, कॉलेज, ऑफिस सब बंद करना पड़ा, मानो भागती-दौड़ती जिंदगी अचानक थम सी गई हो. लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया, सभी अपने-अपने घरों में बंद हो गए. घर में रहने की वजह से लोगों की दुनिया चारदीवारी में सिमट कर रह गई, वहीं इस खाली समय में घर की रसोई कई लोगों के लिए एक प्रयोग साबित हुई. लॉकडाउन खत्म होने के बाद कई लोगों ने अपने रसोई के अनुभव को कौशल और अपने व्यवसाय में बदल लिया. 

पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटन आजीविका की चुनौती

उत्तराखंड के जोशीमठ में जो कुछ हो रहा है, उसे प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव निर्मित आपदा कहा जा रहा है. आर्थिक दृष्टिकोण से पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जिस तरह से बिना किसी ठोस योजना के निर्माण कार्य किया गया, यह उसी का दुष्परिणाम है. हालांकि किसी भी क्षेत्र के विकास से सबसे अधिक लाभ स्थानीय नागरिकों को ही मिलता है. एक और जहां इलाके का विकास होता है वहीं दूसरी ओर लोगों को रोजगार और आजीविका के अवसर भी मिलते हैं. लेकिन उत्तराखंड के ही कुछ ज़िले और क्षेत्र ऐसे हैं जहां पर्यटन के असीमित अवसर उपलब्ध होने के बावजूद स्थानीय नागरिक उसका भरपूर लाभ नहीं उठा पा रहे हैं. हालांकि वह नवीन पर्यटन आयामों के माध्यम से इसे अपनी आजीविका का साधन बना सकते हैं

सम्यक प्रयास से बदलेगी बिहार की शिक्षा व्यवस्था

बिहार के सरकारी स्कूलों में इन दिनों नये-नये प्रयोग हो रहे हैं. ये प्रयोग प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा से अधिक से अधिक बच्चों को जोड़ने के लिए किये जा रहे हैं. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने, ड्राॅपआउट बच्चों को स्कूल कैंपस तक लाने तथा पूरी घंटी तक बच्चों के विद्यालय में ठहराव के लक्ष्य को पूरा करने के लिए राज्य का शिक्षा विभाग गंभीर दिख रहा है. राज्य सरकार का ध्यान भी शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने में लगा है. लेकिन कुछ बुनियादी कारणों से सरकारी प्रयासों को अपेक्षित सफलता मिलना अभी बाकी है. हालांकि, पिछले दशकों की अपेक्षा वर्तमान में बिहार के सरकारी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रकचर में काफी सुधार हुआ है, लेकिन क्वालिटी एजुकेशन में अभी बहुत काम करने की जरूरत है.

अधूरी सड़क से पूरा विकास संभव नहीं

केंद्र प्रशासित जम्मू कश्मीर बदलाव की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है. यदि अशांति के कुछ मामलों को छोड़ दिया जाए तो पहले की अपेक्षा इस केंद्र शासित क्षेत्र में विकास के कई स्वरुप देखने को मिले है. बड़ी संख्या में निवेशकों के यहां रुचि दिखाने से रोज़गार के अवसर बढ़ने की संभावना बन रही है. कई स्तरों पर विकास का काम जोरों शोरों से किये जा रहे हैं. चाहे फ्लाईओवर हो या रोड कनेक्टिविटी, ऐसा कोई जिला नहीं है, जहां काम में तेजी ना आए हों. पिछले कुछ सालों में इस काम में सबसे अधिक तेज़ी आई है. इसकी सबसे बड़ी वजह केंद्र सरकार का वह महत्वाकांक्षी विज़न है जिसके तहत इस क्षेत्र को पर्यटन के साथ साथ उद्योग के दृष्टिकोण से भी विकसित करना है.

रोहतास टू राजस्थान – ब्राइड ट्रैफिकिंग का नया रूट

ऐसा नहीं है कि ब्राइड ट्रैफिकिंग के मामले सिर्फ बिहार के सीमांचल या उत्तर बिहार तक ही सीमित है. कोविड-19 की चौतरफा मार से इसका विस्तार अब दक्षिण बिहार के विभिन्न जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में भी हो गया है. यानी बिहार में जहां जहां गरीबी दस्तक देती है, शादी के नाम पर बेटियों को बेचने का सिलसिला चल पड़ता है. उत्तर बिहार के वैशाली और मुजफ्फरपुर से लेकर दक्षिण बिहार के रोहतास तक के कई जिले हैं जहां कोविड के दौरान ब्राइड ट्रैफिकिंग (शादी के नाम पर लड़कियों की तस्करी) के मामले सुर्खियों में आए थे. इनमें से प्रत्येक जिले में ट्रैफिकर अपनी सहुलियत के हिसाब से अपना रूट और राज्य तय करते हैं. जैसे रोहतास से नाबालिग बच्चियों को ब्राइड ट्रैफिकिंग के जरिए तकरीबन 1300 किलोमीटर दूर राजस्थान ले जाया जाता है. राजस्थान की किसी नामालूम सी जगह पूरी जिंदगी बिताने के लिए.

रूढ़िवादी समाज को चुनौती देती ग्रामीण महिलाएं

दुनिया की आधी आबादी यानी नारी शक्ति का दो रूप हम देख पा रहे हैं. एक तरफ तो वो चांद को छू रही है, एवरेस्ट फतह कर रही है, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर और मुख्यमंत्री तक बन रही हैं तो वहीं दूसरी और हमारे गांव में जहां देश की बड़ी आबादी निवास करती है वहां लड़कियों का बीच में ही स्कूल छुड़वाकर विवाह करा देना और उन्हें मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रखना आम बात है. सरकार के भरसक प्रयासों के बावजूद आज भी देश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बाल विवाह किए जाते हैं. देश के 10 प्रमुख राज्यों जहां सबसे अधिक बाल विवाह होते हैं, उनमें राजस्थान भी अहम है. इस राज्य में केवल बाल विवाह ही नहीं बल्कि यहां महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का भी व्यवहार किया जाता है. उनसे जुड़े फैसले भी पुरुषों द्वारा ही लिए जाते हैं.

डिजिटल साक्षरता से अनभिज्ञ ग्रामीण किशोरियां

आज का युग सूचना तकनीक का युग है। सूचना क्रांति की इस दौड़ से पूरी दुनिया ग्लोबल विलेज बन गई है। सूचना भेजने से लेकर प्राप्त करने तक के सभी कार्य अब सुलभ और अनिवार्य होते जा रहे हैं। ऑनलाइन परीक्षा, बैंक लेनदेन, व्यापार-धंधा, पढ़ाई-लिखाई, देश-दुनिया के समाचार, सूचना, योजना, परियोजना, कार्यक्रम आदि की जानकारी प्राप्त करना बहुत आसान हो गया है। स्मार्ट मोबाइल के आ जाने से सारा काम चुटकियों में हो जा रहा है। पढ़े-लिखे के अलावा अनपढ़ भी स्मार्ट फोन (डिजीटल टूल्स) के इस्तेमाल करके नवीनतम जानकारियों से रू-ब-रू हो रहे हैं। यूं कहे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मोबाइल ने मुश्किल काम को सर्वसुलभ बना दिया है। लेकिन अभी भी देश की एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसके पास यह सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं है.