Charkha Feature Hindi

ग्रामीणों को कोरोना से बचाने जुटी आदिवासी किशोरियां

कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान मध्य प्रदेश के सुदूर आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य कर्मियों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। ग्रामीण सर्दी, जुकाम, खांसी और बुखार से ग्रसित होने के बावजूद अस्पताल जाने से डर रहे थे। उनके मन में यह डर घर कर गया था, कि कहीं डॉक्टर कोरोना न बता दें और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़े। जहां से जिंदा घर वापस आने की संभावना कम है। उनकी यही जिद उन्हें मौत के मुंह में धकेल रहा था।

चरखा द्वारा “संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स 2020” सम्मान समारोह आयोजित

नई दिल्ली, चरखा डेवलपमेंट कम्युनिकेशन नेटवर्क ने शुक्रवार 16 जुलाई को ” संजॉय घोष मीडिया अवार्ड 2020″ सम्मान समारोह का ऑनलाइन आयोजन किया। जिसमें ऐसे 5 विशेष लेखकों के काम को सम्मानित किया गया जिन्होंने पिछले 6 महीनों में, देश के ग्रामीण और दूरदराज के कुछ क्षेत्रों से ऐसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग की है जिन्हें आमतौर पर राष्ट्रीय स्तर की “मुख्यधारा” मीडिया में जगह नहीं मिल पाती है। इन 5 पुरस्कार विजेताओं को पिछले साल 11 राज्यों से प्राप्त 37 आवेदनों में से चुना गया था।इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ‘अहिंसा कन्वर्सेशन’ की संस्थापक रजनी बख्शी ने पुरस्कार विजेताओं को संबोधित किया और उन्हें बधाई दी। अपने संबोधन में रजनी बख्शी ने संजॉय घोष के साथ काम करने के अपने अनुभवों को साझा किया।

गांवों में रोजगार की सुविधाएं होंगी तो पलायन रुकेगा

कोरोना के संक्रमण ने जिस तरह गांवों को प्रभावित किया था, उससे यह साफ अंदाजा हो गया था कि इसे लेकर अभी भी लोगों में जागरुकता का अभाव है। वहीं अभी भले ही आंकड़ों में कमी आई है और टीकाकरण की रफ्तार को बल दिया गया है मगर कोरोना के तीसरे लहर को लेकर लोगों में डर कायम है। ‘हाउ इंडिया लिव्स’ ने बीबीसी मॉनिटरिंग के शोध का आंकड़ा देते हुए बताया है कि दूसरी लहर के दौरान देश के ग्रामीण इलाकों में कोरोना तेज़ी से अपना पैर पसारने में कामयाब रहा था। जिसके पीछे अनेक कारण थे। इनमें युवाओं के पास अपने ही इलाके में रोजगार नहीं होने के कारण उनका पलायन करना भी एक प्रमुख कारण था।

स्टार्टअप के जरिए रोजगार सृजन कर रहे हैं युवा

युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार हमेशा नये कदम उठाती है ताकि युवा अपना रोज़गार का सृजन स्वयं कर सकें। शहरी क्षेत्रों के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं के लिए भी केंद्र सरकार ने दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना की शुरुआत भी की थी ताकि वह अपने स्किल को निखार कर अन्य युवाओं के अंदर भी स्वयं का रोज़गार उत्पन्न करने का जोश भर सकें। यूएनडीपी के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में 121 करोड़ युवा हैं, जिनमें सबसे अधिक 21 प्रतिशत युवा भारतीय हैं। अगर इन युवाओं को बेहतर स्किल और अवसर उपलब्ध कराए जाएं।

रेशम के धागों से अपनी पहचान बुनती महिलाएं

महिलाओं को लेकर समाज में व्याप्त धारणाएं बदल रही हैं। अब महिलाएं अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर भूविज्ञान तक, हर क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक महिला सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। बिहार सरकार की ओर से भी महिलाओं के रोज़गार से जुड़ी योजनाओं पर बल दिया जाता रहा है।

सतर्कता ने मांगनाड गांव को कोरोना त्रासदी से बचाया था

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी, ऐसा कोई शहर या गांव नहीं जहाँ करोना ने अपना रोध्र रूप ना दिखाया हो। करोना की इस दूसरी लहर ने वैसे तो हर देश को अपनी चपेट मे लिया। परन्तु भारत मे ऐसा भयंकर कोहराम मचाया कि राज्य सरकार हो या केंद्रीय सरकार, सब के स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत ख़राब हो गई। इस महामारी ने राजा हो या रंक, बड़ा हो या छोटा, कोई भी जात या धर्म का हो, किसी को नहीं बक्शा। हालांकि अब तक यह साफ़ नहीं हो सका है।

कोरोना महामारी में मजदूर वर्ग की आजीविका संकट में

दुनिया अभी कोरोना की दूसरी लहर से पूरी तरह उभरी भी नहीं है कि कुछ देशों में फिर से बढ़ते आंकड़े तीसरी लहर की आशंका को जन्म देने लगे हैं। कोरोना की दूसरी लहर ने भारत में सबसे अधिक तबाही मचाई थी। इंसानी जानों के अलावा इसने अर्थव्यवस्था को भी ज़बरदस्त नुकसान पहुंचाया है।

महामारी में रोजगार और पोषण का इंतज़ाम करती महिलाएं

बंजर होती जमीन और सूखे के हालात पर इस समय पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। परंतु भारत की ग्रामीण महिलाएं इसकी तोड़ खुद ही अपने परिश्रम से निकाल रही हैं। वह कोविड-19 के लॉकडाउन के समय बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का हर संभव प्रयास कर रही हैं। यह उनकी रोज की लड़ाई है।

झाड़फूंक से नहीं, जागरूकता से हारेगा कोरोना

कोरोना के कहर से पूरा देश लगातार जूझ रहा है। भले ही आंकड़ों के कम होने पर देश के कई राज्य अनलॉक की प्रक्रिया अपना रहे हैं लेकिन स्थिति के अभी भी सामान्य होने की उम्मीद दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही है। पहले डेल्टा और अब डेल्टा प्लस वैरियंट ने सरकार से लेकर वैज्ञानिकों तक की चिंता बढ़ा दी है।

पहाड़ी क्षेत्रों की महिलाओं का प्रसव भगवान भरोसे होता है

मां के गर्भ में शिशु उसका ही अंश होता है और हर मां को अपना शिशु प्यारा होता है। यही कारण है कि उसे जन्म देते समय वह असहनीय दर्द भी सहर्ष सहन करती है। दरअसल गर्भावस्था महिलाओं के लिये महत्वपूर्ण क्षण होता है, जिसे प्रत्येक नारी महसूस करना चाहती है। यह प्रकृति द्वारा महिलाओं को दिया गया अनुपम वरदान है।

लैंगिक विषमता और लैंगिक हिंसा का कारण है जलवायु परिवर्तन

पूरी दुनिया इस समय कोरोना महामारी से जूझ रही है। पिछले लगभग दो वर्षों से मानव इस संकट से निकलने का प्रयास कर रहा है। लेकिन टीकाकरण और तमाम सावधानियां बरतने के बावजूद करोड़ो लोग इससे प्रभावित हो चुके हैं और लाखों जाने जा चुकी हैं। इसके बावजूद इस संकट को समाप्त करने का कोई ठोस उपाय नज़र नहीं आ रहा है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि ज़रा सी लापरवाही कोरोना की तीसरी लहर को आमंत्रण दे सकती है, जो दूसरी लहर से भी अधिक खतरनाक साबित होगी।

महिलाओं के सामूहिक प्रयास से दूर हो रहा कुपोषण

देश में महिलाओं के उत्थान व सशक्तिकरण के लिए शिक्षा से बेहतर विकल्प क्या हो सकता है। शिक्षा जीवन में प्रगति का एक शक्तिशाली माध्यम है, लेकिन ग्रामीण भारत में ज्यादातर महिलाएं शिक्षा से वंचित हैं। जो स्कूल जा सकीं उनमें से बहुत कम महिलाओं ने ही उच्च शिक्षा तक का सफर तय किया। ऐसे में क्या ग्रामीण महिलाएं सामाजिक व आर्थिक रूप से सशक्त एवं समृद्ध बन सकती हैं?

कैनवास पर रंग बिखेरने वाले हाथ फावड़ा चलाने पर मजबूर

मध्यप्रदेश के डिंडोरी जिले से 50 किलोमीटर दूर जबलपुर-अमरकंटक मार्ग पर पाटनगढ़ गांव को गोंड चित्रकला का जन्म स्थान माना जाता है। जनगण सिंह श्याम के माध्यम से गोंड चित्रकला शैली को यहीं से विस्तार मिला और यहां के कलाकार विदेशों में गये। वर्तमान में इस गांव के अधिकांश स्त्री-पुरुष चित्रकला में निपुण हैं। लगभग दो सौ चित्रकार गांव में रहकर कलाकर्म से आजीविका चलाते हैं।

लॉकडाउन की मुसीबत झेलते सब्जी किसान

देश में कोरोना संक्रमण की दर लगातार कम होने के बाद भले ही हालात सुधर रहे हों और राज्य धीरे धीरे अनलॉक की तरफ बढ़ रहे हैं, लेकिन इस दौरान देश की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान झेलनी पड़ी है। हालांकि मीडिया में उद्योग जगत के नुकसान की चर्चा हो रही है। लेकिन इसका बहुत बड़ा नुकसान कृषि क्षेत्र को भी उठाना पड़ा है। विशेषकर इस दौरान छोटे स्तर के किसानों की हालत और भी ज़्यादा ख़राब हो गई है।

आधी अधूरी ग्राम पंचायत कोरोना का मुकाबला कैसे करेगी?

कोरोना महामारी का संक्रमण भले ही देश में कम होता नज़र आ रहा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रसार अपेक्षाकृत बढ़ा है। यह अलग बात है कि शहरों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में आंकड़ों को इकठ्ठा करना मुश्किल है, इसलिए इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के सटीक आंकड़ों को जमा करना मुश्किल है। लेकिन इस बात से इंकार करना कि ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं बढ़ा है, किसी भी प्रकार की जल्दबाज़ी होगी।

ग्रामीण महिलाओं की पहुंच से दूर है स्वास्थ्य व्यवस्था

भारत क्षेत्रफ़ल के नज़रिए से दुनिया का सातवां सबसे बड़ा देश है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम के कोने कोने तक यहां गांव बसे हैं। इसीलिए कहा जाता है कि “भारत की आत्मा गांव में बसती है।” अब जहां देश की आत्मा बसती है, तब तो और ज़रुरी हो जाता है कि हम वहां की मौजूदा ज़रूरत अर्थात स्वास्थ्य व्यवस्था सिस्टम को टटोलें और देखे कि ज़मीनी हकीकत क्या है?

कोरोना काल में झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे ग्रामीणों का जीवन

कोरोना की दूसरी लहर का प्रभाव भले ही धीरे धीरे कम हो रहा है, लेकिन इसका खौफ अब भी शहर से लेकर गांव तक देखा जा सकता है। चारों तरफ चीख, पुकार, मदद की गुहार, सांसों को थामे रखने के लिए जद्दोजहद ने हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार समेत पूरे देश के गांव-गांव में कोरोना ने दस्तक दिया। डॉक्टर, दवा, अस्पताल, ऑक्सीजन, जांच और टीकाकरण के लिए लोग अपने स्तर से व्यवस्था करते रहे।

पर्यावरण संरक्षण के जुनून ने बनाया ‘ग्रीन कमांडो’

यूं तो पूरी दुनियां में ज्यादातर इंसानों का जन्मदिन मनाया जाता है, लेकिन क्या आपने कभी किसी इंसान को पेड़ों का जन्मदिन मनाते देखा या सुना है? अगर नहीं सुना है तो छत्तीसगढ़ के एक पर्यावरण प्रेमी यह कार्य पिछले 18 सालों से करते आ रहे हैं, इसी तरह वह रक्षा बंधन पर हर साल पेड़ों को राखी यानि रक्षा सूत्र भी बांधते हैं और जीवनभर उनकी देखभाल करने का वचन देते हैं। वे पेड़ों को अपना मित्र समझते हैं, उनकी देखभाल अपने बच्चों की तरह करते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी बेटी का नाम भी ‘प्रकृति’ रखा है।

कोरोना काल में ग्रामीणों के लिए सहायक बनी बैंक सखियां

भारतीय समाज में महिलाओं की आजादी और सशक्तिकरण की बात पर भले ही आज भी कुछ वर्ग प्रश्न चिन्ह लगा रहे हों, मगर बदलते वक्त के साथ अब महिलाओं ने इसे अपने अंदाज में नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है। घर कीचौखट के बाहर की दुनिया में भी ग्रामीण महिलाएं उन्नति की सीढ़ियां चढ़ती नजर आ रही हैं। केवल खेती किसानी ही नहीं बल्कि बैंकिंग कार्य में भी वें अपना जौहर दिखा रही हैं। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि महिलाएं घर और बाहर दोहरी जिम्मेदारियों को एक साथ निभाते हुए सशक्तिकरण और आर्थिक विकास

अंधविश्वास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण में उलझता महिलाओं का निर्णय

भारतीय समाज के केंद्र में जब-जब महामारी आती है तो सिर्फ़ महामारी ही नहीं आती, बल्कि उसके साथ आती है बहुत सारी भ्रांतियां, अंधविश्वास और ऊटपटांग आडंबर। भारत में जब 19वीं सदी में चेचक जैसी महामारी ने पैर पसारा तो ज्यादातर ग्रामीण इलाको में इसे देवी या माता का नाम देकर कई प्रकार के अंधविश्वासो से जोड़ा गया। तब से लेकर आज तक, यदि किसी को ऐसा कुछ भी होता है तो ज्यादातर लोगों के मुंह से निकलता है कि -“माता आ गयी है।” ऐसी ही स्थिति के बहुत से उदाहरण हमें 1961 की हैजा महामारी में भी नज़र आये और पोलियो महामारी के दौरान भी दिखाई दिए थे।

किशोरी बालिकाओं का भविष्य कुपोषण के कब्जे में

कोरोना महामारी के इस दौर में ऐसी बहुत सी बीमारियां हैं, जो आज भी मानव जीवन को धीरे धीरे अपना शिकार बना रही हैं। लेकिन उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। इन्हीं में एक कुपोषण भी है, जो युवाओं विशेषकर किशोरी बालिकाओं में काफी पाया जा रहा है। इसका परोक्ष रूप से नकारात्मक प्रभाव आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य पर देखने को मिलेगा। शरीर के लिए आवश्यक संतुलित आहार लम्बे समय तक नहीं मिलना ही कुपोषण है। इसके कारण बालिकाओं और महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।

घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज़ बुलंद करनी होगी

हमारा देश भारत अपने पौराणिक विचारों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। धर्मों के प्रति गहरी आस्था ने भारत को पूरे विश्व में सिरमौर बनाया है। नदियों को मां कहकर बुलाना, अतिथियों को भगवान का दर्जा देना, यह सब शायद ही किसी और देश में देखने को मिल सकता है। लेकिन इन सबके बीच हमारे देश में कुछ ऐसी भी रूढ़िवादी परंपराएं हैं, जो दुनिया भर में हमारी छवि खराब करती है। उनमें से एक महिलाओं पर होने वाली हिंसा भी है। घर पर हम स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं, लेकिन महिलाओं के लिए कभी-कभी घर भी सुरक्षित जगह नहीं होता है।

स्वच्छ जल से आज भी वंचित हैं आदिवासी

आधुनिकता के इस दौर में जब शहर के तकरीबन हर दूसरे-तीसरे घर के लोग आरओ का फिल्टर पानी पीते हैं तो वहीं देश के ग्रामीण इलाकों में कुछ ऐसे भी गांव हैं जहां वर्षों से सरकारी तंत्र की अनदेखी के कारण लोगों को पीने के लिए साफ पानी तक नसीब नहीं हो रहा है। सरकार द्वारा पेयजल को लेकर प्रति वर्ष लाखों रुपया खर्च जरूर किया जाता है, लेकिन इसका लाभ देश में ग्रामीण अंचल को मिल रहा है या नहीं, इसकी निगरानी व्यवस्था अब भी कमजोर है। मसलन छत्तीसगढ़ के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के आदिवासी परिवार आज भी पीने के साफ़ पानी जैसी अपनी मूलभूत आवश्यकता के अभाव में पीढ़ियों से अपना जीवन जीते आ रहे हैं।

कोरोना से कराह रहे गांव

आजकल कोरोना महामारी का कहर ग्रामीण इलाकों में तेजी से बढ़ रहा है। चाहे वह उत्तरप्रदेश हो, बिहार, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश हो या फिर कोई अन्य राज्य। जबकि राज्य सरकारों का दावा है कि कोरोना महामारी का संक्रमण गांवों में बढ़ने से रोकने के लिए ट्रैकिंग, टेस्टिंग और ट्रीटमेंट के फार्मूले पर कई दिन से सर्वे अभियान चलाया जा रहा है। यानी अभी तक सिर्फ़ सर्वे? ऐसी ही कुछ स्थिति राजस्थान की भी है। खबरों के मुताबिक राजधानी जयपुर के देहाती इलाके चाकसू में एक ही घर में तीन मौतें कोरोना के कारण हुई हैं। यही हाल टोंक जिले का भी है। महज दो दिनों में टोंक के अलग-अलग गांवों में दर्जनों लोगों की एक दिन में मौत की खबरें आईं हैं।

थार के जैव विविधता को बचाने की जरूरत

पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर ज़िलों के गांवों में रेगिस्तान की विलुप्त हो रही जैव विविधता के अवषेष देखने को मिलते हैं। वास्तव में थार की वनस्पतियां और जीव-जंतु लुप्त होने की स्थिति में है। इसका नकारात्मक प्रभाव यहां के पर्यावरण, समुदाय की आजीविका, कृषि, पशुपालन, खान-पान, स्वास्थ्य और पोषण पर पड़ रहा है। प्रकृति के साथ समन्वय से चलने वाला जीवन अब पूरी तरह से यांत्रिक हो गया है।

शुरुआती लापरवाही से ग्रामीणों पर कोरोना पड़ा भारी

मध्य प्रदेश के गांवों में सन्नाटा पसरा है। ग्रामीण सर्दी, जुकाम, खांसी और बुखार से ग्रसित हैं। अस्पताल न जाने, जांच न कराने और वैक्सीन न लेने की जिद, इन्हें मौत के मुंह में धकेल रहा है। जो अपनों को खो रहे हैं, उनकी आंखें नम है। लेकिन वह कोरोना संक्रमण से मौत पर बात करने को तैयार नहीं है। अधिकतर मृत्यु जांच न होने के कारण सामान्य माना जा रहा है। लेकिन गांव में मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अकेले पन्ना जिले के पवई विकासखंड के 18 गांवों में पिछले एक हफ्ते में 17 लोगों की मौत हुई है।

स्वर्गीय मारियो नोरोहना की याद में

दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो अपने व्यवहार से दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। चरखा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, मारियो नोरोहना का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनके साथ-साथ उनके आसपास के लोग भी उनकी नैतिकता से प्रभावित थे – लेकिन दुर्भाग्य से जिन्होंने अपने चरित्र से दूसरों को प्रभावित किया। 24 अप्रैल की सुबह covid 19 महामारी की वजह से, हम सब छोड़ कर अपने असली मालिक के पास चले गए।

मासिक धर्म की चुनौतियों से जूझती पहाड़ी किशोरियां

21वीं सदी को भले ही हम तरक्की और विज्ञान का युग कहते हों, लेकिन ज़मीनीं हक़ीक़त यही है कि आज भी समाज में अमीरी-गरीबी, ऊंच-नीच, शहरी-ग्रामीण और यहां तक कि महिला और पुरुष के बीच भी गहरा भेदभाव किया जाता है। महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा न केवल कमज़ोर माना जाता है बल्कि उसे कई प्रकार की रूढ़िवादी मान्यताएं और परंपराओं के बंधन में भी जकड़ दिया जाता है। विशेषकर माहवारी के दौरान उसके साथ सबसे अधिक अनुचितपूर्ण व्यवहार किया जाता है।

गांव के बाल वैज्ञानिक ने बनाया स्मार्ट डस्टबिन

प्रतिभा की कोई उम्र नहीं होती है। छोटी उम्र में भी नौनिहालों को यदि उपयुक्त शिक्षा, परिवेश व सुविधा मिले, तो वह भी अपनी प्रतिभा से देश और दुनिया में नाम रोशन कर सकते हैं। इसके लिए घर-परिवार से ही नौनिहालों के बालमन को बारीकी से समझना होगा। उनकी हरेक गतिविधियों को मनोवैज्ञानिक ढंग से देखना होगा। इसमें माता-पिता के अलावा विद्यालय की भी ज़िम्मेदारी होती है। जहां सभी तरह के बच्चे एक साथ पढ़ते हैं।

रूढ़िवादी प्रथा छीन रहा है महिलाओं का अधिकार

राजस्थान के इतिहास में बालिकाओं व महिलाओं को लेकर राजा महाराजाओं के समय से ही कई प्रथाएं और परम्पराएं चली आ रही हैं। जो कहीं उनके अधिकारों को बचाती है, तो कई उनके अधिकारों का हनन भी करती है। इन्हीं में एक नाता प्रथा भी है। कहने को यह प्रथा महिलाओं को अधिकार देने और अपने मनपसंद साथी के साथ जीवन बिताने का अधिकार देने की बात करता है, लेकिन वर्तमान में यह प्रथा महिला अधिकारों के हनन का माध्यम बनता जा रहा है।

पंचायत में भूमिका तलाशती महिला जनप्रतिनिधि

मौसम में बदलाव के लक्षण नज़र आने लगे है। मौसम में उमस और गर्मी के साथ साथ पंचायत चुनाव ने भी दस्तक दे दी है। उत्तर प्रदेश में पंचायती चुनाव इसी महीने मार्च में होने वाले थे लेकिन महामारी और बोर्ड परीक्षा के चलते इसे थोड़ा और बढ़ाना पड़ा। तारीख़ों के आगे बढ़ जाने से पंचायती चुनाव की दांव-पेंच, आंकलन और उठापटक कम नहीं हुई है। सब कुछ उसी गति से चल रहा है। गांव, मोहल्ले की बहस रोज़ चौराहे तक जाती है और शाम ढलने पर फिर गांव लौट आती है।

कुपोषण मिटाने के लिए महिलाओं ने पथरीली ज़मीन को बनाया उपजाऊ

ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 के अनुसार भारत में कुपोषण की स्थिति 107 देषों में से 94 स्थान पर है। भारत के संदर्भ में यह डराने वाला आंकड़ा हैं, क्योंकि भारत अपने पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और इंडोनेशिया से भी पीछे है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 14 फीसदी लोग कुपोषण के शिकार है जबकि 37 फीसदी बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से छोटे कद के है।

महिला कमांडो ने गांव को बनाया नशामुक्त

बदलते वक्त के साथ अब महिलाओं की स्थिति भी बदल रही है। किसी जमाने में चूल्हा-चौका तक सीमित रहने वाली महिलाएं आधुनिक समाज में देश की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे पदों को सुशोभित कर चुकी हैं और वर्तमान में राज्यपाल, मुख्यमंत्री से लेकर आईएएस-आईपीएस जैसे दायित्वों का भी बखूबी निर्वहन कर रही हैं। बात देश के ग्रामीण क्षेत्रों की करें तो गांवों में भी सरपंच, उप सरपंच के साथ ही पंचायत प्रणाली के अन्य पदों पर रहकर गांव की दशा और दिशा बदलने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

कोरोना संकट से फिर लग सकता है शिक्षा पर ग्रहण

देश में अर्थव्यवस्था और शिक्षा, दो ऐसे महत्वपूर्ण सेक्टर हैं जिसे कोरोना संकट का सबसे अधिक दंश झेलना पड़ा है। हालात सामान्य होने पर अर्थव्यवस्था जहां पटरी पर लौटने लगी थी, वहीं स्कूल कॉलेज खुलने से भी ऐसा लग रहा था कि शिक्षा व्यवस्था फिर से मज़बूत होगी। लेकिन संकट अभी पूरी तरह से टला भी नहीं था कि कोरोना की दूसरी लहर के बढ़ते प्रकोप ने एक बार फिर से चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

नई सोलर तकनीक से ग्रामीणों की बदल रही है दशा

अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की अग्रणी भूमिका का दुनिया ने लोहा मानना शुरू कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस प्रकार से भारत से सौर ऊर्जा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, उसकी चहुं ओर प्रशंसा हो रही है। अब इसका प्रभाव भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में भी नज़र आने लगा है। इसका ताज़ा उदाहरण राजस्थान का करौली ज़िला है।

मशरूम की खेती से रोजगार सृजन करती ग्रामीण महिलाएं

केंद्र और राज्य सरकार की ओर से सभी लोकल को वोकल बनाने पर बल दिया जा रहा है। साथ ही हर तरफ आत्मनिर्भर भारत अभियान की चर्चा हो रही है ताकि लोग न केवल स्वयं रोजगार सृजन कर सकें बल्कि दूसरों को भी रोजगार दे सकें। इसके लिए महिलाओं को भी अधिक से अधिक जोड़ने पर बल दिया जा रहा है। ताकि देश की आधी आबादी भी रोजगार से जुड़ कर देश के विकास में अपना योगदान दे सके।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : गांव तक महिला सशक्तिकरण को मज़बूत करने की ज़रूरत

दहेज़ के लिए मानसिक रूप से प्रताड़ित होने के बाद अहमदाबाद की आयशा द्वारा आत्महत्या ने जहां पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है, वहीं यह सवाल भी उठने लगा है कि हम जिस महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, वास्तव में वह धरातल पर कितना सार्थक हो रहा है? सशक्तिकरण की यह बातें कहीं नारों और कागज़ों तक ही सीमित तो नहीं रह गई है? कहीं ऐसा तो नहीं है।

रोजगार की ख़ातिर फिर पलायन को मजबूर

कोरोना संकट में पहले लाॅकडाउन और फिर हुए अनलाॅक के बाद से देश की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगी है। शहरों के साथ-साथ देश के ग्रामीण इलाकों में भी लोग पुरानी दिनचर्या में वापस लौट आए हैं। लेकिन इन सब में सबसे अधिक मज़दूर तबका ही ऐसा प्रभावित हुआ है, जिसका जीवन अभी भी पूरी तरह से पटरी पर लौट नहीं सका है। दो वक्त की रोटी की जुगत में लाॅक डाउन में लौटे मजदूर अब फिर सुबह से शाम जद्दोजहद कर रहे हैं।

खुद फैसला लेने में सक्षम होती ग्रामीण महिलाएं

भारतीय संसद में महिलाओ की संख्या बढाने के लिए जब तैंतिस प्रतिशत आरक्षण की मांग जोर पकड़ने लगी, तब पुरानी धारा के सोचने वाले पुरुष अपनी दलीलों से महिलाओ की काबिलियत पर सवाल खड़े करने लगे। वह महिलाओ को कुशल गृहिणी बता कर उन्हें घर की सीमाओं तक सीमित करने लगे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर घर की सीमा क्या होती है।

शर्म नहीं, शक्ति का प्रतीक है माहवारी

देश में किशोरी एवं महिला स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में काफी सुधार आया है। केंद्र से लेकर राज्य की सरकारों द्वारा इस क्षेत्र में लगातार सकारात्मक कदम उठाने का परिणाम है कि एक तरफ जहां उनके स्वास्थ्य के स्तर में सुधार आया है, वहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी प्रगति हुई है। कई राज्यों में महिला एवं किशोरियों के कुपोषण के दर में कमी आई है।

किशोरी बालिकाओं की प्रेरणा बनी राधा

जब खुद में हिम्मत, विश्वास और हौसला हो तो रास्ते भी खुद-ब-खुद बन जाते हैं। वास्तव में कोई भी रास्ता छोटा या बड़ा नहीं होता बल्कि हर रास्ता मंज़िल तक पंहुचाने वाला होता है। यह केवल इस बात पर निर्भर करता है कि आप में उस पर चलने का हौसला कितना है। यह कहना है जयपुर से 60 किमी दूर टोंक ज़िला के मालपुरा ब्लॉक स्थित सोड़ा पंचायत की सरंपच छवि राजावत का, जो देश की पहली एम.बी.ए शिक्षा प्राप्त सरपंच है।

ग्रामीण स्तर पर दिख रहा आत्मनिर्भरता का असर

आत्मनिर्भरता के परिणाम अब ग्रामीण स्तर पर दिखाई देने लगा है। ग्रामीण अपनी जमीन पर खेती के साथ-साथ आय बढ़ाने के अन्य साधन भी ढूंढ़ने लगे हैं। विशेषकर ग्रामीण महिलाएं अब मजदूरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू कर रही हैं। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के दौरे के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में इसके कई उदाहरण देखने को मिले। जब सड़क पर सरपट भागती गाड़ी एकाएक पानी के लिए मायाबाई कुमरे की दुकान पर रूकी। गांव लावापानी की 38 वर्षीय महिला माया एक स्वयंसेवी संस्था स्वस्ति द्वारा गठित आस्था

झारखंड में थम नहीं रहा कालाजार का प्रकोप

इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस समय देश और दुनिया में कोरोना एक महामारी का रूप लिया हुआ है। जिसके उन्मूलन के लिए अलग अलग स्तर पर टीका तैयार किया जा रहा है। लेकिन इसके साथ साथ कुछ ऐसी बीमारियां भी हैं, जो चुपके से अपना पैर पसार रही हैं और लोग असमय काल के गाल में समा रहे हैं।

घूंघट में रह कर स्वावलंबी बनती ग्रामीण महिलाएं

इंसान और पशु में बस इतना ही फ़र्क है कि पशु अपना सारा जीवन खाने और सोने में गुज़ार देता है, लेकिन इंसान की शिक्षा उसे इतना सक्षम बनाती है कि वह खुद के साथ साथ अपना और अपने समाज को बढ़ाने में मदद करता है। बाबा साहब अम्बेडर हमेशा कहा करते थे कि “यदि किसी समाज की तरक्की का अंदाज़ा लगाना है।

बीहड़ में स्त्री स्वाभिमान की जागरूकता

भारतीय समाज में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं पीरियड्स को लेकर कई मिथकों और संकोचों में अपना जीवन गुजार रही हैं। ’पीरियड्स’ महिलाओं की जिंदगी से जुड़ा एक अहम विषय है, जिस पर खुलकर बात नहीं होती है। देश के बड़े शहरों में हालात जरूर थोड़े बदले हैं, लेकिन गांव और कस्बों में अभी भी ये चुप्पी का मुद्दा है, जिसे शर्म और संकोच की नजर से देखा जाता है।

मजबूत हौसले ने दी उड़ान

पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए कहा था कि पिछले कुछ वर्षों में देश में मुस्लिम बालिका शिक्षा की दर में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। पहले की अपेक्षा स्कूल जाने वाली मुस्लिम बालिकाओं की संख्या बढ़ी है। स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय का निर्माण और अन्य योजनाओं के कारण यह परिवर्तन संभव हुआ है।

संकट को संभावनाओं में बदलती महिलाएं

कोरोना संक्रमण के संकट को पीछे छोड़ते हुए भारत ने एक साथ दो वैक्सीन बना कर जो इतिहास रचा है, उसे मानव सभ्यता कभी नहीं भूलेगी। लेकिन संक्रमण काल में जिस तरह से इंसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, उस काले अध्याय को भी भूला पाना नामुमकिन है। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता गया था, वैसे-वैसे लोगों के मन में इसकी दहशत भी बढ़ती गई थी। भारत में इस वौश्विक महामारी का सबसे बुरा प्रभाव महाराष्ट्र में हुआ।

थार के पारिस्थितिक तंत्र में अक्षय ऊर्जा की संभावनाएं

रेगिस्तान में अक्षय ऊर्जा अर्थात सौर और विंड एनर्जी निर्माण की अपार संभावनाएं हैं। यहां साल के अधिकांश दिनों में सूर्य दर्शन होता है तथा तेज हवाएं भी चलती रहती हैं। अक्षय ऊर्जा की संभावनाओं को देखते हुए सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर ऊर्जा उत्पादन और वितरण पर कार्य चल रहा है। जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर के कुछ क्षेत्रों में सोलर प्लांट और पवन चक्कियां

20 साल बाद भी सुविधाओं से वंचित हैं पहाड़ी गाँव

बेहतर सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार एवं आजीविका की अपेक्षाओं के साथ उत्तरप्रदेश से पृथक हुए राज्य उत्तराखंड आज भी इन मूलभूत आवश्यकताओं के लिए तरस रहा है। राज्य स्थापना के 20 वर्ष बाद भी इस पर्वतीय प्रदेश का रहवासी जीवन के लिए जरूरी मूलभूत ज़रूरतों के लिए संघर्षरत है।

नही हो रहा किशोरी बालिकाओं की समस्या का समाधान

संपूर्ण राजस्थान विविधताओं से भरा है। यह विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं, प्रचलनों, प्रथाओं और सामाजिक, भौगोलिक परिवेश को अपने अन्दर समाहित किये हुये है। यहां महिलाओं की आन, बान और शान का एक लंबा इतिहास रहा है। उनके जीवन चक्र को समाज अपनी इज़्ज़त और सम्मान से जोड़ता रहा है। यही कारण है कि इस क्षेत्र की महिलाओं और बालिकाओं को कई समस्याओं का सामना भी करना पड़ता

खुद बीमार है उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं पटरी से उतर चुकी हैं। खास तौर से भौगोलिक विषमताओं वाले यहां के पर्वतीय क्षेत्रों में मातृ एवं शिशुओं की देखभाल के सरकारी इंतजाम अति दयनीय दशा में हैं। पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों के हालात और भी ज़्यादा खराब हैं। यहां के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र स्वयं गंभीर रूप से बीमार हैं। इन केंद्रों मे पानी व बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं होने से ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

स्तन कैंसर के खतरे से अनजान हैं ग्रामीण महिलाएं

बिहार के एक ग्रामीण इलाके की रहने वाली कुसुमलता (बदला हुआ नाम) को स्तन कैंसर के कारण अपने स्तन हटवाने पड़े थे, क्योंकि उसकी जान पर बन आई थी। इस प्रक्रिया से उसकी ज़िंदगी तो बच गई लेकिन उसका जीवन और भी नरकीय हो गया। स्तनों के हटने के बाद उसके पति ने उसकी परवाह करना छोड़ दिया क्योंकि अब उसे अपनी पत्नी में प्यार नज़र नहीं आता था।

रोज़गार का सशक्त माध्यम बन सकता है पशुधन

ऐसे वक़्त में जबकि देश में रोज़गार के अवसर कम होते जा रहे हैं, बड़ी बड़ी कंपनियां कर्मचारियों की छटनी कर रही हैं, रोज़गार के अवसर लगातार सीमित होते जा रहे हैं, ऐसे वक़्त में भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में रोज़गार के अवसर उपलब्ध हैं। वास्तव में देश की एक बड़ी आबादी कृषि तथा कृषि आधारित रोज़गार पर निर्भर है। जिसमें पशुपालन और उससे जुड़े अन्य रोज़गार भी शामिल है। इन्हीं में डेयरी उद्योग भी जुड़ा है।

विलुप्त होती कला को बचाने की चुनौती

बड़े पैमाने पर आर्टिफिशियल (प्लास्टिक, फाइबर व अन्य मिश्रित धातुओं से निर्मित) वस्तुओं का उत्पादन और घर घर तक इनकी पहुँच से जहाँ एक ओर कुम्हार (प्रजापति) समुदाय के पुश्तैनी कारोबार को पिछले कुछ वर्षों से भारी क्षति का सामना करना पड़ा है, वहीं दूसरी ओर चीन निर्मित वस्तुओं का आयात और बड़े पैमाने पर भारत के बाजारों में उनका व्यवसाय भी उनके आर्थिक पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण रहा हैं।

थार के संसाधनों पर मंडराता अस्तित्व का खतरा

राजस्थान का थार क्षेत्र केवल बालू की भूमि ही नहीं है, बल्कि कुदरत ने इसे भरपूर प्राकृतिक संसाधनों से भी नवाज़ा है। लेकिन धीरे धीरे अब इसके अस्तित्व पर संकट के बादल गहराने लगे हैं। यह संकट मानव निर्मित हैं। जो अपने फायदे के लिए कुदरत के इस अनमोल ख़ज़ाने को छिन्न भिन्न करने पर आतुर है। यहां की शामलात भूमि (सामुदायिक भूमि) को अधिग्रहित कर उसे आर्थिक क्षेत्र में तब्दील किया जा रहा है।

आपदा को अवसर में बदलती ग्रामीण महिलाएं

कोरोना महामारी ने देश-दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम जनता की आर्थिक स्थिति को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। एक तरफ जहां लाॅक डाउन में लोगों का रोजगार छिन गया तो अनलाॅक होने के बाद भी लोगों को आसानी से काम नहीं मिल रहा है। शहरी क्षेत्रों में मजदूरों की आवश्यकता होने के कारण जैसे-तैसे उन्हें काम मिल भी जा रहा है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में रोज़गार की समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है। बड़ी संख्या में लोग अभी भी रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं।

गोबर के दीयों से मिला रोज़गार

छत्तीसगढ़ में गोधन न्याय योजना शुरू होने के बाद से यहां गोबर का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है, कल तक सिर्फ कंडे और खाद बनाने के काम आने वाला गोबर अब रंग बिरंगे दीयों का रूप लेकर दीपावली में जगमगाने को तैयार है। स्व-सहायता समूह की महिलाएं गोठानों में खाद बनाने के लिए खरीदे गए गोबर का अब दूसरा उपयोग दीया बनाने में भी कर रही हैं।

लघु उद्योग बदल सकते है पहाड़ी गांवों का स्वरूप

युक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रकाशित नवीनतम मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में बेरोज़गारी दर 2004-2005 में 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2017-2018 में 4.2 प्रतिशत थी जो राज्य सरकार के लिए चिन्ता का विषय है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि उच्च बेरोज़गारी दर के पीछे सरकारी व निजी क्षेत्रों में रोज़गार के पर्याप्त अवसर पैदा करने में राज्य की अक्षमता है।

मुख्यधारा से अभी भी दूर है पहाड़िया समाज

संथाल परगना प्रमण्डल के हरित पर्वत मालाओं, घने जंगलों, स्वच्छंद नदी-नालों तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए अंग्रेजों, जमींदार और महाजनों जैसे शोषक वर्गों से लोहा लेने वाली आदिम जाति पहाड़िया समुदाय का अपना एक विशिष्ट इतिहास रहा है। इसे भारत की दुर्लभ जनजातियों में से एक माना जाता है। उपलब्ध दस्तावेज़ों व प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पहाड़िया समुदाय संथाल परगना प्रमण्डल के आदि काल के बाशिंदे हैं।

फसल ख़राबी से किसान हैं परेशान

नए कृषि कानूनों के खिलाफ देशभर में किसानों के साथ सामाजिक संगठनों से लेकर बड़े बड़े राजनीतिक दल विरोध दर्ज करा रहे हैं। वहीं किसान सड़कों पर उतर कर इस बिल को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपनी खड़ी फसलों को कीट पतंगों की प्रकोप से बचाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।

भारत में महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार

भारत में अब महिलाओं पर अत्याचार, हिंसा और शोषण जैसी अमानवीय घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. पूरे देश में महिलाएं हर जगह, हर समय, हर क्षण, हर परिस्थिति में हिंसा के किसी भी रूप का शिकार हो रही हैं. जैसे-जैसे देश आधुनिकता की तरफ बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे महिलाओं पर हिंसा के तरीके और आंकड़ें भी बढ़ते जा रहें हैं. यदि हिंसा के नए रूपों की बात करें तो इनमें अश्लील कृत्य, फूहड़ गाने, किसी महिला की शालीनता को अपमानित करने के इरादे से प्रयोग किये जाने वाले शब्द, अश्लील इशारा, गलत नीयत से पीछा करना, अवैध व्यापार, बदला लेने की नीयत से तेज़ाब

पानी जब ज़हर बन गया

दो साल से खाट पर पड़ा हूँ। हाथ-पैर काम नहीं करता। दर्द ऐसा कि सहा तक नहीं जाता। क्या करूँ बाबू, परिवार के लिए बोझ ही तो बन गया हूँ? बस अब पड़े-पड़े मौत का इंतजार कर रहा हूं! बांस और टाट से निर्मित एक टूटी सी झोपड़ी के अंधेरे कोने में, खाट पर बैठा 58 वर्षीय सफल मुर्मू जिंदगी की अंतिम घड़ियाँ गिनते हुए अचानक फफक पड़ता है।

भारी शारीरिक पीड़ा के बावजूद अपनी जिंदगी से हार नहीं मानने वाला व्यक्ति हार रहा है तो सिर्फ अपनी शारीरिक अक्षमता की वजह से। यह कड़वी सच्चाई उस गाँव की है, जहां जीवन देने वाला जल ही वहां के लोगों के लिये जहर साबित हो रहा है। जल जनित बिमारी फ्लोरोसिस के कारण झारखंड के साहेबगंज जिलान्तर्गत बरहेट विधानसभा क्षेत्र

ज्यादा मुनाफ़ा दे रहा जैविक खेती का सामूहिक प्रयास

देश में कृषि सुधार विधेयक पर जमकर घमासान मचा हुआ है। सरकार जहां इस विधेयक को ऐतिहासिक और किसानों के हक़ में बता रही है, वहीं विपक्ष इसे किसान विरोधी विधेयक बता कर इसका पुरज़ोर विरोध कर रहा है। हालांकि संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद यह विधेयक अब राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जा चुका है, जिनकी सहमति के बाद विधेयक लागू हो जाएगा। लेकिन इसके बावजूद विपक्ष इसके खिलाफ सड़कों पर उतरा हुआ है। इस संवैधानिक लड़ाई से अलग देश का अन्नदाता अपनी फसल को बेहतर से बेहतर बनाने में लगा हुआ है, ताकि देश में अन्न की कमी न हो।

शिक्षा का अलख जगाए रखने की जद्दोजहद

लॉक डाउन की भयावह स्थिति से गुजरते हुए पिछले छह महीनें से विश्व के तकरीबन सभी छोटे-बड़े देश मैराथन बंदी का अभिशाप झेलने पर मजबूर हैं। इस दौरान पूरी दुनिया में जन जीवन पूरी तरह ठहर सा गया है। इस वैश्विक संकट में न तो स्कूल-काॅलेजों में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं को काॅपी-किताब के साथ सड़कों पर देखा जा रहा है, और न ही सरकारी-गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं, संगठनों सहित सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक व राजनीतिक संस्थाओं की गतिविधियां नज़र आ रही हैं। 

प्लास्टिक की गिरफ़्त में इंसानी ज़िंदगी

आज के वैज्ञानिक युग में न केवल मानव विकास की रफ्तार बढ़ी है बल्कि विज्ञान ने इंसान के जीवन को और भी अधिक सरल और सुविधाजनक बना दिया है। हालांकि नई तकनीक के प्रयोग ने कई बिमारियों, चुनौतियों और समस्याओं को भी जन्म दिया है। विज्ञान और आधुनिक तकनीकों के प्रयोग ने प्राकृतिक वातावरण को दूषित ही नहीं किया बल्कि मानवीकृत वैज्ञानिक वातावरण का जाल

सरकारी नीतियों से परेशान उत्तराखंड के किसान

कोरोना महामारी ने जिस तरह से पूरी दुनिया को प्रभावित किया है, उसकी गूंज सदियों तक इतिहास में सुनाई देती रहेगी। इस महामारी ने मानव जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। विशेषकर दुनिया भर की अर्थव्यवस्था इस महामारी की शिकार हुई है। दुनिया के सात सबसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था तक इस महामारी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी है। कोरोना की मार से भारत की अर्थव्यवस्था भी बहुत हद तक चरमराई है।

कौन सुनेगा शिक्षकों का दर्द?

विशेषकर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले हज़ारों टीचर्स की ज़िंदगी इस कोरोना काल में प्रभावित हुई लेकिन ना तो मीडिया और ना ही समाज को इसकी कोई फिक्र है। इन सबके बावजूद टीचर्स से पूर्व की अपेक्षा ज़्यादा काम लिया जा रहा है और वेतन के नाम पर कहीं खाली लिफाफा थमाया जा रहा है, तो कहीं वेतन में कटौती की जा रही है।

समुदाय की सहभागिता के बिना योजनाएं सफल नहीं

हमारे देश में बहुत सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। केंद्र से लेकर राज्य और ब्लॉक स्तर से लेकर पंचायत स्तर तक अनेकों योजनाएं हैं। इन सभी योजनाओं का अंतिम लक्ष्य समुदाय को लाभ पहुँचाना है। उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाना और क्षेत्र का विकास करना है।

नहीं रुक रहा महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध

कोरोना के आपदा काल में जब समूचा विश्व महामारी से बचाव के लिए जीवनोपयोगी वैक्सीन बनाने की कवायद में जुटा है, जब पूरी दुनिया इस आफत से मानव सभ्यता को बचाने में चिंतित है ऐसी मुश्किल घड़ी में भी महिलाओं की सुरक्षा एक अहम प्रश्न बनी हुई है, क्योंकि संकट की इस घड़ी में भी महिलाओं के खिलाफ अपराध में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। अनलॉक प्रक्रिया में जहां महिलाओं के खिलाफ हिंसा के सभी स्वरूपों में वृद्धि हुई है। वहीं लॉक डाउन के दौरान भी महिलाएं हर पल अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए समाज

महिलाओं के साथ भेदभाव करता है समाज

भारत में हिंसा के सबसे अधिक केस महिलाओं से ही जुड़े होते हैं। जिनका रूप कुछ भी हो सकता है। हालांकि पुरूष प्रधान इस देश में हमेशा महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता रहा है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कमतर आंका जाता है। उसे कमज़ोर, असहाय और अबला समझ कर उसके साथ कभी दोयम दर्जे का तो कभी जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है।

गोबर से बदलेगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सूरत

अब तक सड़क पर पडे़ जिस गोबर के पांव में लगने भर से हम आक्रोशित हो जाते हैं, वही गोबर अब छत्तीसगढ़ के लाखों किसानों और पशुपालकों के लिए आय का माध्यम बन रहा है। राज्य सरकार ने गोधन न्याय योजना के तहत प्रदेश भर में किसानों और पशुपालकों से गोबर खरीदने की नई योजना शुरू की है। इससे कम लागत पर वर्मी कंपोस्ट (जैविक खाद) बनाकर पुनः किसानों को जैविक खाद के रूप में सस्ते दामों पर बेची जाएगी।

कहानी उनकी, जिन्होंने शिक्षा की लौ थामे रखा

भारत समेत पूरी दुनिया इस समय जिस आपदा और संकट से गुज़र रहा है, उसे लंबे समय तक इतिहास में याद रखा जायेगा। मुश्किल की इस घड़ी में जब हर तरफ दुःख का ही सागर हो, ऐसे समय में कोई एक सकारात्मक पहल भी सुकून देने वाला होता है। विशेषकर जब यह पहल महिला शिक्षा से जुड़ी हो और ऐसे इलाकों से जहां साक्षरता की दर अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कम हो, तो यह सुकून और भी बढ़ जाता है।

सब पढे-सब बढे, लेकिन कैसे?

देश मे 3-4 साल बाद एक बार फिर से शिक्षा नीति में बदलाव होने जा रहा है। अच्छी बात यह है कि यह बदलाव होने जा रहा है। अच्छी बात यह है कि यह बदलाव प्राथमिक स्तर पर भी की गई है। यानि बच्चों के बुनियादी ढांचे को मजबुत करने पर भी जोर दिया गया है। नई नीति के तहत इस बात पर फोकस किया गया है कि प्राथमिक लेवल से ही बच्चे का रुझान सीखने की तरफ बना रहे। यह एक अच्छी सोच है। साइंस और कॉप्म्यूटर के इस दौर में पढने के साथ-साथ सीखने पर भी जोर दिया जाना जरुरी है।

अपनी जान पर जोखिम, ताकि बची रहे आपकी जान

इस वर्ष का स्वतंत्रता दिवस पिछले तमाम वर्षों से अलग तरह से मनाया जा रहा है। हालांकि कोरोना काल की काली छाया के बावजूद जश्ने आज़ादी की धूम फीकी नहीं पड़ रही है। आज़ादी के इस जश्न में एक तरफ जहां स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया जा रहा है वहीं कोरोना योद्धाओं का भी सम्मान किया जा रहा है। कोरोना को हराने और देश को सुरक्षित रखने में स्वास्थ्यकर्मी और पुलिस बलों ने जो योगदान दिया है, उसका पूरा भारतवर्ष ऋणी रहेगा।

वनवासी महिलाओं को मुख्यधारा से जोड़ने की ज़रूरत

महिलाओं के जीवन और उनके अधिकारों के संबंध में आज भी भारतीय समाज दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ जहां उसके बिना समाज का अस्तित्व मुमकिन नहीं माना जाता है वहीं दूसरी ओर उसे उसके सभी अधिकारों से भी वंचित रखने का प्रयास किया जाता है। हालांकि पितृसत्तात्मक समाज की बहुलता होने के बावजूद देश के ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां समाज के संचालन की ज़िम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर होती है।

ठहर गई है ख़ानाबदोशों की ज़िंदगी

कोरोना के खतरे के बीच भले ही धीरे धीरे व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो गईं हों, लेकिन इस महामारी ने अपने पीछे जो निशान छोड़ा है, उसे सदियों तक मानव जाति भुला नहीं पायेगी। इससे न केवल लाखों लोग असमय काल के गाल में समा गए बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ध्वस्त गई है। कोरोना के दुष्प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा। इसका सबसे ज़्यादा नकारात्मक प्रभाव देश के गरीब, पिछड़े और मुश्किल से दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करने वाले मज़दूरों की ज़िंदगी पर पड़ा है।

गरीब महिलाओं का जीवन कोरोना से अधिक डरावना है

किसी भी प्रकार की आपदा का सबसे अधिक प्रभाव सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों पर पड़ता है। आर्थिक नुकसान के रूप में भले ही मध्यम व उच्च आय वालों को अधिक नुकसान होता है, लेकिन जो वर्ग सामान्य समय में निम्न आय से अपनी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते, किसी भी प्रकार की आपदा में बूरी तरह से टूट जाते हैं। महिलाएं सभी वर्गों में किसी न किसी प्रकार की निःसहायता में जकड़ी हुई हैं।

माहवारी पर चुप्पी तोड रही बरड की बालिकाएं

राजस्थान के बूंदी जिले के तालेडा ब्लॉक की १२ ग्राम पंचायतो के क्षेत्र को बरड क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र बूंदी जिला मुख्यालय से ५० कि.मी. दूर दक्षिण पश्चिम दिशा में चित्तौडगढ और भीलवाडा जिले की सीमा से लगा हुआ है। यह इलाका बंजर, पथरीला एवं खनन क्षेत्र है। यहा खदानों में काम करने भारत के अलग अलग राज्यों से लोग आते है। इस कारण बरड क्षेत्र को मिनी भारत भी कहा जाता है। डाबी कस्बे को बरड की ह्दय स्थली कहा जाता है।

मालिकाना हक से वंचित महिला किसान

राजस्थान मे बाडमेर जिले की पचपदरा तहसील के कबीरनगर की महिला किसान उमा देवी (बदला हुआ नाम) के पति का देहांत १९८७ में हो गया था। आजीविका का मुख्य साधन खेती, पशुपालन और मजदूरी है। एक बेटी है जिसका पालन पोषण किया, पढाया-लिखाया और शादी की। पति के देहांत के बाद उनके हिस्से की खातेदारी कृषि भूमि उमा देवी के नाम होनी थी। परिवार के भाई-बंधुओं ने चुपके-चुपके अपने नाम करवा ली।

बालिका शिक्षा के प्रति सोच बदलने की जरूरत

कोरोना महामारी से लडने में डॉक्टर और नर्स से लेकर सभी स्तर के स्वास्थ्यकर्मी जिस प्रकार से अपना योगदान दे रहे है, उसे इतिहास में सुनहरे अक्षरों मे लिखा जायेगा। विशेषकर भारत में आवश्यक सुरक्षा उपकरणों की कमी के बावजूद अपनी जान जोखिम डालकर नर्स करोना पीडितों की जिसप्रकार से सेवा कर रही है, वह प्रशंसनीय है। आपात स्थिती की इस घडी में सेवा भाव से उन्होनें यह साबित कर दिया है।