Charkha Feature Hindi – 2022

मलिन बस्तियों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ता म्यूज़ियम स्कूल

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की रहने वाली शिबानी घोष एक ऐसी महिला है, जिन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद न सिर्फ अपने परिवार के लिए बल्कि वंचित समुदाय के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया. उनके इस संकल्प को पूरा करने में उनके पति प्रदीप घोष ने भी साथ दिया. शिबानी कहती हैं, कि उनके पति ने ही उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित किया.

झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का कमज़ोर ढांचा

झारखंड की स्थापना के 21 वर्ष बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की लचर स्थिति बनी हुई है. कई स्तर पर योजनाओं के संचालन के बाद भी स्थिति और आंकड़े निराशाजनक हैं. जनसंख्या के प्रतिफल में स्वास्थ्य और विकास के संकेतक अन्य राज्यों की तुलना में कमजोर हैं. स्वास्थ्य और विकास एक दूसरे के पूरक हैं. ऐसे में एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिये उसके नागरिकों को सेहतमंद होना जरूरी है.

मजदूर वर्ग को विशेष सहायता की ज़रूरत है

दो साल के तांडव के बाद फिलहाल देश में कोरोना की स्थिति पूरी तरह से कंट्रोल में है. जिसके बाद धीरे धीरे आम जनजीवन पटरी पर लौट रहा है. स्कूल से लेकर कल कारखाने तक पहले की तरह सामान्य रूप से काम करने लगे हैं. हालांकि चीन और कुछ पश्चिमी देशों में इसका प्रकोप फिर से बढ़ने से देश में भी जून-जुलाई तक चौथी लहर आने की आशंका व्यक्त की जा रही है. 

क्या रेगिस्तान को विकास की बलि देनी होगी?

जैसलमेर जिले के गांव कुछड़ी में आलाजी लोक देवता के नाम से छोड़ी गई 10 हजार बीघा ओरण भूमि भू-सैटलमेंट के दौरान राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई. एक दर्जन गांवों के मवेशी तथा जीव-जंतुओं की प्रजातियां इसी ओरण की शरण में जीवन-यापन करती हैं तथा थार की जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में योगदान देती है. पूर्वजों ने ओरण में विविध प्रकार के जल स्त्रोत बनाए थे जिनसे पशुओं व जीव-जंतुओं को चारा, पानी मिल सके. कुछड़ी गांव के लोगों ने इस भूमि का एक बड़ा भाग विकास के नाम पर एक निजी कंपनी को आवंटित किए जाने की आशंका जताई.

मिथक तोड़कर क्रिकेट में जौहर दिखाती आदिवासी लड़कियां

मध्य प्रदेश का हरदा जिला जो नर्मदापुरम का हिस्सा है और शांति और खुशहाली के लिए जाना जाता है. यहां का मुख्य व्यवसाय खेती-किसानी है. यहां की जमीन बहुत ही उपजाऊ मानी जाती है. इसके बावजूद आर्थिक और सामाजिक रूप से यह इलाका अभी भी बहुत पिछड़ा हुआ है. यहां की 70 फीसदी आबादी आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती है. पिछड़ेपन के बावजूद आजकल यह इलाका आदिवासी लड़कियों के कारण लोगों की ज़ुबान पर है. इन दिनों यहां की कुछ आदिवासी लड़कियां क्रिकेट में अपना कमाल दिखा रही हैं.

पुल को तरसता सरहदी गांव अराई मलका

शब्बीर अहमद की बेटी के पैर में चोट लगी है, उन्होंने उसका शहर जाकर इलाज करवाया। पुंछ से 20 किलोमीटर की यात्रा कर वो जब अपने गांव अराई मलका (Arai Village) पहुंचे तो उन्हें अपनी बेटी को चारपाई पर लेटाकर घर तक ले जाना पड़ा, क्योंकि उनके गांव में सड़क तो है लेकिन पुल नहीं है, जिसकी वजह से कोई गाड़ी घर तक नहीं जाती। वो कहते हैं कि अगर पुल होता तो शायद उन्हें आज इस मुसीबत का सामना नहीं करना पड़ता। चारों तरफ से पहाड़ों से घिरे जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) के अराई गांव में ज्यादातर जनजातीय लोग बसते हैं।

पुरुष प्रधान क्षेत्र में सीमा ने बनाया अपना मुक़ाम

इंद्रा नूई, नीता अंबानी, राधिका अग्रवाल, वाणी कोला ये ऐसी शख्सियत हैं, जो किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. हाल के दशकों में भारत में महिला उद्यमियों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. देश में लगभग 13.76 प्रतिशत उद्यमी महिलाएं हैं और 6 प्रतिशत महिलाएं भारतीय स्टार्टअप की संस्थापिका भी हैं. लेकिन बढ़ोत्तरी के बाद भी यह आंकड़े बहुत कम हैं. अमेरिकन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार यूएस में लगभग 13 मिलियन महिला अपना स्वयं का व्यवसाय चलाती हैं अथवा संभालती हैं. यह आंकड़ा यूएस में सभी कंपनियों के 42 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है.

युवा किसान सीख रहे हैं रसायन मुक्त खेती

भोपाल से 40 और सीहोर मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर अबीदाबाद पंचायत के रहने वाले धन सिंह वर्मा कुछ माह पहले तक अपने खेत से सिर्फ एक फसल ले पाते थे, क्योंकि उन्हें खेती की सही तकनीक नहीं मालूम थी. कभी-कभी तो वह डीएपी खाद नहीं मिल पाने के कारण यहां-वहां भटकते रहते थे और दुकानदार को मुंह मांगा दाम देकर खाद खरीद लाते थे. इससे उनकी खेती की लागत बढ़ जाती थी, लेकिन अब वह खुश हैं. उनके खेत के पास ही 25 एकड़ की वह जमीन जहां कम लागत से दो जैविक फसल का उत्पादन हो रहा है.

भूखों को खाना उपलब्ध कराता छपरा का रोटी बैंक

साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भुखमरी और कुपोषण के मामले में 117 मुल्कों की सूची में हमारा देश 102वें स्थान पर है. वैश्विक भूख सूचकांक साल 2021 की रिपोर्ट के अनुसार भारत को कुल 116 देशों की सूची में 101वें स्थान पर रखा गया है. साल 2017 में नेशनल हेल्थ सर्वे (एनएचएस) की रिपोर्ट बताती है कि देश में 19 करोड़ लोग हर रात खाली पेट सोते हैं. भारत के लगभग सभी शहरों में सड़क किनारे आज भी कुछ लोग खाली पेट सोने को मजबूर हैं. हर साल बाढ़, सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं लोगों की गिनती को और भी बढ़ा देती हैं. पिछले दो सालों से कोविड- 19 ने भी लोगों की हालत खराब कर रखी है.

किसानों के लिए मुनाफा साबित हो रही है लेमन ग्रास की खेती

गेहूं, धान, दलहन, तिलहन जैसे पारंपरिक फसलों से इतर आमदनी बढ़ाने के लिए झारखंड के किसानों ने अब लेमन ग्रास जैसे नये उत्पादों से मुनाफा कमाने का एक नायाब तरीका ढूंढ निकाला है. बिना अधिक परिश्रम के ही न्यूनतम पूंजी पर अधिकतम लाभ का यह तरीका धीरे धीरे ही सही, किन्तु लगातार फैलता ही जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि सूखा प्रभावित इलाकों में भी आसानी से यह लगाया जा सकता है.

झारखंड के हस्तशिल्प कला में रोज़गार की संभावनाएं

झारखंड में हस्तशिल्प के कई शिल्पकार अब हुनरमंद बन रहे हैं. इन्हें वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार और झारखंड सरकार के हस्तशिल्प, रेशम एवं हस्तकरघा विभाग प्रशिक्षण दे रहा है. इसके माध्यम से शिल्पकारों और उनके परिवारों को आर्थिक संबल प्रदान किया जा रहा है. झारखंड में बंबू क्राफ्ट, डोकरा शिल्प, एप्लिक, हैंडलूम, रेशम, काथा स्टिच, टेराकोटा और जूट सहित कई हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जा रहा है. डोकरा शिल्प के डिजाइनर सुमंत बक्शी बताते हैं कि यह प्राचीन कला है

समस्या जल नहीं, जल विभाग है

कहा जाता है कि जल ही जीवन है. आखिर जल जीवन हो भी क्यों न. कपड़े धोने से लेकर खाना बनाने तक और नहाने से लेकर अपनी प्यास बुझाने तक हमें पानी की आवश्यकता पड़ती है, यानि पानी के बिना ज़िन्दगी जीना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. इंसान से लेकर सभी जीव जंतु और पेड़ पौधे तक पानी बिना अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह हैं. इसीलिए प्रकृति ने भी इसकी महत्ता को समझते हुए धरती पर भूमि से अधिक जल का भंडार दिया है. धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू कश्मीर में भी प्राकृतिक जल स्रोत के माध्यम

बिहार के बुनकरों को बाजार की ज़रूरत

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से हैंडलूम (हस्तकरघा) की अपनी समृद्ध परंपरा और हुनरमंद बुनकरों के हुनर को दुनिया के सामने लाने की अपील की थी. बावजूद इसके आज बिहार के विभिन्न जिलों के बुनकरों की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है. पहले से उनके पास काम की कमी तो थी ही, पिछले दो सालों में कोरोना के कारण उनके उत्पाद से जुड़े बाजार पर भी गहरा असर पड़ा है.

जन शक्ति से जल शक्ति की मिसाल है मूंडवा गांव

नागौर से 22 किलोमीटर दूर मूंडवा कस्बा आधुनिक विकास और पारंपरिक व्यवस्थाओं के बीच सामंजस्य के साथ विकसित हो रहा है. कस्बे के पास एक सीमेंट का प्लांट निर्माणाधीन है, जिससे मूंडवा ही नहीं, आस-पास के कई गांवों की आबोहवा बदलने वाली है. लेकिन वर्तमान में मूंडवा तथा आस-पास के गांवों के लोग न केवल पारंपरिक जल संसाधनों के रख-रखाव से प्रकृति का पोषण करने के अपने मानवीय कर्तव्य को जीवन में समाहित किए हुए हैं बल्कि पुरातन काल से आज तक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक

आदिवासी चित्रकारी में बसा है भूरी बाई का रचना संसार

भारतीय भील कलाकार भूरी बाई को वर्ष 2021 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया. भील जनजाति की संस्कृति को दीवारों और कैनवास पर उकेरने वाली मध्यप्रदेश की भूरी बाई को जब महामहिम राष्ट्रपति ने नई दिल्ली में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया, तो उनके चेहरे की चमक देखते ही बनती थी. दरअसल आदिवासी कलाकारों ने दुनिया के जितने भी चित्र खींचे, वे उनके अनुभव, उनकी स्मृति, और कल्पना में उपजे थे और उन्हें देखने वाली आंखों से भी