द्विमासिक, अक्टूबर - नंवबर 2008

कार्य को शब्‍दों में ढालते हुए
 
 


चरखा विकास संवाद के पिछले अंक यहां

सरकार के हजार दावों के बाद भी शिमला में बाल मजदूरी

शफीकुर रहमान खान

शिमला रेलवे स्टेशन से नीचे सरकार ने एक बस्ती बसायी है नाम दिया है कुष्‍ठ कालोनी। यह वह कॉलोनी है जहाँ सरकार ने कुष्ठे रोगीयों का पुर्नवास किया है। कॉलोनी के पास ही एक अनाधिकृत बस्ती बसी है नाम है महाशिव कॉलोनी। इस बस्ती में करीब 70 परिवार रहते हैं। अधिकतर परिवार प्रवासी हैं और अलग अलग राज्यों से रोजगार की तलाश में यहॉ 10 वर्ष पूर्व आये हैं। उल्लेखनीय हैं कि ये सभी परिवार अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन जाति से हैं।

शायद यही कारण है कि बदहाली और मजबुरीयों को देखने के लिये ज्यादा मेहनत करने की आवश्ययकता नहीं है। यहाँ बदहाली का तांडव स्पष्ट दिख जाता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गो के चेहरे से उनकी दयनीय स्थिति और मजबुरी का अहसास स्पष्टत रूप से देखा जा सकता है।

इस बस्ती का हर बच्चा 4-5 साल की उम्र से ही भीख मॉगने निकल जाता है और थोडा अधिक उम्र होने पर कबाड चुनने के काम में लग जाता है।

कुछ एैसी ही स्थिति है फन वर्ल्ड और महासु पिक्स, देवीधार मन्दिर शिमला में । यह वह पर्यटन स्तम्भ है जहाँ मंद मौसम में भी सैकडों पर्यटक रोज आते हैं। और कुफरी से उक्त स्थल तक घोडे चढना इन पर्यटकों का रोमांच दूगना करदेता है। दो किलोमीटर के इस सफर में पर्यटक जहाँ शाही सवारी के मद में और घोडों की टॉपों से झुम उठते हैं। वहीं इन टापों से घोडों की लगाम थामने वाले हाथों का बचपन कुचला जाता है। मगर टापों की आवाज इन बच्चों की आवाजों को दबा जाती है। यही वजह है कि इतना बडा पर्यटन स्थल होने के बावजुद सरकारी अमले को घोडे चलाने वाले ये बच्चे दिखाई नहीं देते। सुबह से शाम तक ये बच्चे अनवरत चक्कर लगाते रहते हैं ये चक्कर समान्य तौर 10 से 15 बार का होता है। 8 से 15 साल के ये बच्चे एक साथ दो से चार घोडे संचालित करते हैं। अक्सर देखने में आता है कि कम उम्र के ये बच्चे घोडे नहीं सम्भाल पाते और पर्यटक गिर जाते हैं। जिसके बाद पर्यटक तो गुस्से में इन बच्चों के साथ मार पीट करते ही है इनके ठेकेदार भी इन बच्चों की जर्बदस्त पिटाई करते हैं।

यहाँ काम करने वाले अधिसंख्यक बच्चें प्रवासी हैं जो गॉव के लोगों अथवा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ काम की तालाश में यहाँ आये हैं। यहाँ जितने भी घोडा चलाने वालों की युनियन हैं उनमें धडल्ले से बच्चों को घोडा वाहक बनाया जा रहा हैं जो उस दूर्गम रास्ते पर यात्रियों के अवागमन के साधन हैं। यहाँ ना केवल बाल श्रम का मामला है बल्कि इस पुरे प्रकरण में सबसे दूखद पहलु है कि ये बाल श्रमिक दिन भर के कार्य के बाद रात के समय घोडों के चारा खिलाने के लिये जंगल की तरफ लेकर चले जाते हैं। जहाँ उन्हें आराम और घोडों की रखवाली दोनों साथ साथ करनी पडती है। कई बार घोडों को वन विभाग के क्षेत्रों में प्रवेश करने पर इन बच्चों को वनकर्मीयों का शोषक भी बनना पडता है। ये तो संगठित बाल मजदूरों के उदाहरण मात्र हैं मगर यहाँ तो हर कदम बाल मजदूर अपनी बदहाली से आपका स्वागत करते मिल जायेंगें।

यहाँ काम करने वाले बच्चें अधिक्तर उत्तर प्रदेश ,बिहार, झारखण्ड और नेपाल से आते हैं। इनमें नेपाली बच्चों में अधिसंख्यक तो अपने मॉ बाप के साथ आये हैं। इनमें कुछेक घरों से भागकर अथवा पडोसीयों द्वारा लाये गये हैं। मगर पुरबिया राज्यों से आने वाले बच्चें पडोसीयों अथवा गाँव के किसी व्यक्ति द्वार लाये गये हैं। बाल मजदूरी पर काम करने वाले अनुभवी कहते हैं कि यह पडोसी या गॉव के भाई चाचा जैसे लोग दरअसल बाल मजदूरों के दलाल होते हैं। कुफरी में भी स्थितियाँ लगभग एक समान है। अधिसंख्यक बच्चे मानते हैं कि उनके काम का भुगतान उसे किया जाता है जो उन बच्चों को लेकर आया था। इसका कारण बताया जाता है कि यह दलाल पैसों को आसानी से उन बच्चों के घर पहूंचा देते हैं। मगर इसमें उन वयस्कों का कितना हिस्सा होता है बच्चों को नहीं पता। स्थानीय निवासी बताते हैं कि जिस ठेकेदार को अपने काम के लिये बच्चों की आवश्यकता होती है वह यहाँ काम करने वाले उन राज्यों के लोगों को बच्चे लाने के लिये पैसे देते है।

वास्तव में यह बच्चे शिमला में सीजन के दौरान और अधिक हो जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे बरसात के दिनों में जंगल भी फूल दिख्नेने लगते हैं। मगर शिमला के इन बरसाती फूलों की जडें बिहार उत्तर प्रदेश और नेपाल जैसी जगहों पर है। सबसे अधिक अफसोसजनक बात यह है कि बरसाती फूलों की तरह ये बच्चे भी अपनी हाडतोड मेहनत के बाद एक सीजन से ज्यादा काम करने के लायक नही रह पाते क्योंकि सीजन के काम 24 धंटे चलते हैं और लगातार काम करवाने के लिये इनके मालिक इन बच्चों को अफीम जैसे नशों का आदि बना देते हैं।

शिमला में बाल श्रम का ये संगठित रूप वास्तव में बाल अधिकारों और मानवीय मूल्यों के विरूद्व ही नहीं आपितु न्यूनतम मजदूरी और काम के घंटे तय ना होना अपने आप में बंधुआ मजदूरी की श्रेणी में ही रखा जा सक्ता है। जो सरकार और प्रशासन को सीधे तौर पर चुनौती देती है भले ही हिमाचल सरकार राज्य में बंधुआ मजदूरी उन्मूलन के लक्ष्य को पुरा करने का दावा करे मगर ये बच्चे बंधुआ मजदूर हैं जिन्हें काम के बाद निकाल फेका जाता है। यह सम्पूर्ण समाजिक जीवन के लिये एक चुनौती हैं जो समान रूप से सभी राज्यों व देशों की स्थिति को सीधा प्रभावित करती है। आवश्यकता है कि शिमला प्रशासन अपने क्षेत्र को इस श्रम जाल से मुक्त रखे ताकि देवभूमि अपनी अपनी पावनता सदैव ही बरकरार रखे।

(चरखा फीचर्स)

 
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